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परशुराम आश्रम
चितौड़ से लगभग 60 कि.मी. दूर उत्तर पुर्व में मातृ कुन्डिया राजस्‍थान के हरिद्वार के रूप में प्रसिद्ध है। बनास नदी के तट पर स्थित यह प्राचीन तीर्थ सदियों से मनुष्‍यों की आस्‍था का केन्‍द्र रहा है। चितौड़गढ़, उदयपुर, कपासन त‍था भीलवाड़ा से यह स्‍थान सड़क मार्ग से जुड़ा हुवा हैं। निकटतम रेलवे स्‍टेशन कपासन है। मातृ कुन्डिया से कुछ ही दूरी पर राशमी ग्राम मे महर्षि जमदग्नि अपनी भार्या रेणुका का पुत्र परशुराम सहित निवास करते थे, इस क्षेत्र में वे गो चरण के लिये आते थे। उनके गायों में कपिला व कामधेनू मुख्‍य थी। रेणुका के आग्रह पर महर्षि ने अपने साढू राजा सहरत्रबाहु को समीपवर्ती संगम तट पर आमन्त्रित किया। सहरत्रबाहु की दुष्‍ठता के कारण कामधेनू ऋषि दम्‍पति को त्‍यागकर स्‍वर्ग चली गयी, इससे परशुराम क्रोधित हो उठे। महर्षि जमदग्नि ने बताया कि इसमें दोषी परशुराम की मां है तो उन्‍होनें पिता की आज्ञा से आवेश में आकर अपनी मां का सिर काट डाला लेकिन कटा हुवा सिर परशुराम की भुजा पर चिपक गया, बाद में  जब अपने कृत्‍य पर पश्‍चाताप हुवा तो परशुराम ने बनास नदी के तट पर इस शांत स्‍थल पर तपस्‍या करके भगवान शिव को प्रसन्‍न किया । शिवकृपा तथा पिता के आशीर्वाद से उन्‍हें मातृ हत्‍या के पाप से मुक्ति मिली तथा परशुराम की माता को जीवनदान मिला। इसी घटना की स्‍मृति में इस स्‍थान का नाम मातृ कुन्डिया रखा।
   
 

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