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रामायण सैन्य विज्ञान
आज अधिकांश विद्वान सैन्य विज्ञान को नवीन अध्ययन धारा के रूप में देखते हैं किन्तु, प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में राज्य के सप्तांश की कल्पना की गयी है और उसमें दण्ड व (बल या सेना) का महत्वपूर्ण स्थान है। इस दृष्टि से सैन्य विज्ञान को पुराना ज्ञान कहा जा सकता है, जिसका प्रारम्भ ऋग्वेद से होता है। रामायण कालीन व्यक्तियों को युद्ध कला का ज्ञान था। ”रामायण“ ग्रन्थ के लंका काण्ड में उल्लिखित राम-रावण युद्ध के अतिरिक्त अन्य काण्डों में अनेक युद्धों का उल्लेख मिलता है। जिनमें सैन्य विज्ञान के उद्देश्य, अनुशासन, युद्ध के नियमों, अस्त्र-शस्त्रों, वेतन भत्ता आदि का ज्ञान होता है। सामान्य युद्ध कुछ विशेष मुद्दों के लिए लडे जाते थे। रामायण ग्रन्थ में वर्णित युद्ध के उद्देश्य भी इनसे अलग नहीं है। भूमि प्राप्ति की लालसा, स्त्री का अपमान, उसे प्राप्त करने का लोभ, धन और यश प्राप्त करने की इच्छा, प्रतिशोध और दण्ड देने की उग्रता, व्यक्तियों की ईर्ष्या, अन्याय की भावना, कुमन्त्रणा, हठधर्मिता मुख्य उद्देश्य रहे हैं। सैनिक शक्ति का अधिक होना भी एक कारण माना जाता है जो वर्तमान में भी युद्ध का एक प्रमुख कारण है। तत्कालीन सैन्य विभाजन में अष्ठांग का बोध होता है। पैदल, हाथी, घोडे, रथ की चतुरंगिणी सेना के अलावा, विष्टी (बेगार में पकडे गये बोझ ढोने वाले, नोकारोही, गुप्तचर और देशिक) कर्त्तव्य का उपदेश करने वाले गुरू प्रमुख है। वर्तमान युद्ध में ये सभी अंग तो प्राप्त नहीं होते, किन्तु विष्टी की तरह सहायक सेनाओं का प्रचलन अवश्य है। इनमें सिग्नल कोर, सप्लाई कोर आदि को रखा जा सकता है। देशिक के समान ही आज जनरल अफसर युद्ध का नियोजन करते हैं। पैदल सेना का गठन कई आधारों पर वर्तमान पैदल सेना में मिलता है। ”पति“ तक सेना का प्रथम अंग या जिसमें दस सदस्य होते थे। आज भी सैक्सन में दस सदस्य होते हैं और यह पैदल सेना की निम्नतम इकाई है। सेना में आवश्यकता पडने पर क्षेत्रियों के साथ ब्राह्मण, वैश्य और शूद्रों को स्थान दिया जाता था। युद्ध में स्थायी सैनिकों के अलावा अतिरिक्त भर्ती युद्ध काल में ही जाती थी। अश्व सेना के अन्तर्गत श्रेष्ठ जाति के अश्व रखे जाते थे जिनमें काम्बोजी - दरियायी और वाल्हिल्क देशीय घोडे प्रमुख थे। प्रत्येक योद्धा का रथ अलग-अलग होता था, उस पर अलग-अलग ध्वज होता था और योद्धा की तरह सारथी भी महत्वपूर्ण होता था। तत्काीन युद्ध कला में नौकारोही के अलावा ”शौभ“ नामक विमान का भी उल्लेख मिलता है। सैन्य विज्ञान में अनुशासन का महत्व था। उपयुक्त अवसर पर ही आक्रमण किया जाता था, जब कृषि कार्य नहीं होता था और अनाज घरों में आ जाता था। युद्ध यात्रा के लिए सुगम मार्ग अश्व रथ का होता था। गुप्तचर उस मार्ग की जानकारी रखते थे, सेना के कुच करनें में आगे पैदल, फिर रथ, उसके बगल में घुडसवार दस्ते और सबसे पीछे हाथियों को रखा जाता था। तत्कालीन सेना में वेतन भोगी मित्र सैनिक होते थे। सैनिकों को योग्यतानुसार भर्ती किया था, उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता था। उन्हें वेतन और भत्ता, उपहार और पेंशन प्रदान किया जाता था। युद्ध में हताहत या मृतक सेनिकों के परिवार की देखभाल राज्य करता था। सेना का सेनापति योग्य और गुणवान होता था। वह अस्त्र-शस्त्र संचालन, व्यूह रचना, युद्ध नेतृत्व, तकनीक का ज्ञाता होता था। उकसा युद्ध के पूर्व निर्वाचन किया जाता था, फिर सेनापति पद पर अभिषिक्त किया जाता था। वह शपथ भी लेता था। युद्ध क्षेत्र में सैनिकों और सेनापति के निर्धारित गणवेश होते थे। सेना में मनोबल को बढाने के लिए वाधयन्त्रों, शंखों और प्रचा का सहारा लिया जाता था। प्रमुख अस्त्र-शस्त्रों, का प्रयोग होता था। इनके चार श्रेणी - मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त और यन्त्र मुक्त होते थे। वर्तमान मिसाइलों से मिलते-जुलते ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, वैष्णवास्त्र आदि मुक्तामुक्त अस्त्र प्राप्त होते हैं। धनुष, बाण, गदा, त्रिशुद आदि मुक्त और अमुक्त श्रेणी के अस्त्र-शस्त्र हैं। नालिक और शतघ्नी दो प्रमुक्ष्य यंत्र मुक्त अस्त्र थे। रक्षात्मक कवच का भी प्रयोग किया जाता था जो सिर, बाहें, गला, छाती, हाथों आदि की रक्षा करते थे। सैनिकों के अतिरिक्त सारथी, अश्वों और हाथियों के भी अलग-अलग कवच होते थे। सैन्य साज सामानों का छद्मावरण भी किया जाता था। युद्ध के कई तरीके प्रचलित थे जो अधिकांश अस्त्र-शस्त्रों से लडे जाते थे। इसके अलावा मल्ल युद्ध, द्वन्द्व युद्ध, मुष्टिक युद्ध, प्रस्तरयुद्ध, रथयुद्ध, रात्रि युद्ध और माया युद्ध के भी प्रमाण प्राप्त होते हैं। दिव्यास्त्र युद्ध का अधिक प्रयोग होता था। आज रात्रि युद्ध प्रमुख्य है। वर्तमान युद्ध सामान्यतः रात में ही सम्पन्न होते हैं। व्यूह रचना द्वारा सेना को व्यवस्थित ढंग से खडा किया जाता था। जिसका उद्देश्य अपने कम से कम हानि में शत्रु का अधिक से अधिक नुकसान पंहुचाना था। वे कईं प्रकार के होते थे। बज्र, काँच, सर्वतोभद्र, मकर, ब्याल, गरूड व्यूह अदि नाम प्राप्त होते हैं। ये व्यूह तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुसार बने थे। आज भी युद्ध क्षेत्र में व्यूह रचना का महत्व है। दुर्ग और शिविर रचना भी तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुसार था। रात्ज्य के सप्तांग में दुर्ग का स्थान था, महाभारत में दुर्ग व्यवस्था के सन्दर्भ में पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है। शिविर का युद्ध काल में महत्व ाा। शिविरों में सभी साधन उपलब्ध थे। सेना नायकों, नायकों, सैनिकों और जानवरों सबके लिए अलग-अलग व्यवस्था होती थी। ये शिविर युद्ध की आवश्यकतओं के अनुसार होते थे। मध्यकाल तक शिविर का युद्ध क्षेत्र में महत्व रहा था। महाभारत कालीन निर्धरित युद्ध नियम लम्बे समय तक भारतीय इतिहास में उच्चादर्श के रूप में स्वीकार्य थे। बाद के समय में सैनिक प्रशिक्षण और तकनीक के परिवर्तन से नियमों में परिवर्तन आ गया किन्तु आज इन पर बल दिये जाने की आवश्यकता है। तभी विश्व को निरापद बनाया जा सकता है। निष्कर्षतः तत्कालीन युद्ध के सभी तत्व सेनांग, युद्ध प्रकार, व्यूह रचना, अनुशासन, भत्ता, युद्ध - नियम आदि सब कुछ वैज्ञानिक था और उनमें से अधिकांश को लम्बे समय तक सैन्य विज्ञान में अपनाया गया था किन्तु वर्तमान स्थिति में उनका प्रयोग कम हो गया है। इन तत्वों को अपनाकर भविष्य आज ज्यादा सुरक्षित रह सकता है, ऐसा सोचा जा सकता है, क्योंकि तत्कालीन सैन्य विज्ञान के अन्तर्गत युद्ध मानवता की भावना से लडा जाता था, जो आज के लिए एक शिक्षा है। यदि उसे हम अपना सकें तो न केवल लडने वाले राष्ट्रों का भला होगा बल्कि उससे मानवता भी प्रभावित होगी।
   
 

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