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अमरू जी
पारीक राजपुरोहितों का अमेर में वर्चस्‍व रहा है अत: समृद्धशाली परिवार होना सामान्‍य बात थी।  आमरू जी का जन्‍म ऐसे ही संभ्रांत परिवार में हुआ था। आपने आमेर में लक्ष्‍मीनारायण जी का शिखरबंद मंदिर बनवाया जो आज भी आमेर में अवस्थित है। आपकी  प्राचीन हवेली आज भी जीर्ण शीर्ण  अवस्‍था में आमेर स्थित खेड़ी दरवाजे के उत्तर की ओर है, सागर जाते समय रास्‍ते में पड़ती है। आपकी जागीर में झालाणा ग्राम था।
लक्‍खी चबूतरा- अमरूजी की माताजी ने एक बार कहा बेटा! लाख रुपये कितने होते हैं मैंने नहीं देखे। अमरूजी ने कहा अच्‍छा मां, और फिर सोमवती अमवस्‍या को मकान के चबूतरे पर (अब मकान और चबूतरे के बीच रास्‍ता बन गया है) एक लाख रुपये रख दिये और माताजी से उन एक लाख रुपयो का संकल्‍प करा लिया जिससे अनेकानेक मंदिरों का निर्माण हुआ तथा अन्‍य धार्मिक कार्यों में वे रुपये व्‍यय किए गए। उन मंदिरों में लक्ष्‍मीनारायण जी का मंदिर, जो आमेर के बाजार में बस स्‍टैंड के पास है तथा वर्तमान में ब्राह्मणों के पास है, भी निर्मित किया गया। उक्‍त मंदिर पुरातत्‍व महत्‍व का होने के कारण पुरातत्‍व विभाग ने उस पर अपना बोर्ड भी लगाया है। उक्‍त मंदिर में उसके निर्माण के संबंध में शिलालेख भी था।
   
 

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