दोहा: ये सब भारत भूमि में, रहे विचरते संत।
धर्म बचाते ज्ञान से रहे बढ़ाते पंथ।। ।। 15 ।।
उनमें दादुदयाल के, एक शिष्य थे खास।
जिनका पावन नाम है श्री बनवारी दास।। ।। 16 ।।
इनमें राग, द्वेष नहीं था, कंद मूल फल खाते थे।
भिक्षा के लिए गुफा से बाहर कभी न जाते थे।।
जो जन इन के पास दुखी या किसी अर्थ से आते थे।
वे प्रस00 मन होकर अपना शीघ्र इष्ट फल पाते थ्ो।। 17 ।।
अपने तप साधन हित इनने उत्तरखंड पसंद किया।
वर्ष पच्चीस वहां तप जगको फिर उपदेशानंद दिया।।
उच्च काय ये परम प्रतापी और दीन दुखी हारी थे।
वर तप धारी पर-उपकारी बनवारी बनवारी थे।। 18 ।।