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बनवारी दास जी एवं हरिदास जी

बनवारी दास जी एवं हरीदास जी दोनों ग्राम रतिया (हरियाणा) के रहने वाले थे। आप खांतडिया पुरोहित थे। कहते हैं बनवारीदास जी जन्‍मांध थे-यहां तक कि आपके आंखों की पुतलियां भी नहीं थी। तत्‍समय दादूजी महाराज का प्रभाव एवं उनकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी थी। आपने अपने मन में विचार किया कि यदि दादूजी मुझे रोशनी दे दे तो मैं उनका शिष्‍य बन जाउंगा। ऐसा विचार कर वे दादू जी की शरण में जाने को तैयार हो गये। कहते है कि आप कुछ दूरी पर ही गये होंगे कि दादूजी स्‍वयं आपके समक्ष प्रकट हो गये और आपकी इच्‍छानुसार आपको दादूजी ने नेत्र ज्‍योति दे दी। इस समय बनवारी दास जी की आयु लगभग 85 वर्ष की थी। दादू जी को समक्ष देखकर, उनके दर्शन कर, उनका चमत्‍कार देखकर अनायास ही बनवारी दास जी के मुंह से यह निकला 'बाबा खूब दर्शन दिये'। दादूजी ने कहा कि बाबा तो आप ही रहेगें। और इस प्रकार दादू जी द्वारा उन्‍हें बाबा की उपाधि दे दी गई। बनवारी दास जी दादू जी के 52 शिष्‍यों में से हैं। महंत कैलाश दास जी के अनुसार आप 135 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए।
बनवारी दास जी की तपस्‍या के संबंध में संत सरोज में सुंदर वर्णन किया गया है-

दोहा:   ये सब भारत भूमि में, रहे विचरते संत।
धर्म बचाते ज्ञान से रहे बढ़ाते पंथ।।  ।। 15 ।।
उनमें दादुदयाल के, एक शिष्‍य थे खास।
जिनका पावन नाम है श्री बनवारी दास।। ।।  16 ।।
इनमें राग, द्वेष नहीं था, कंद मूल फल खाते थे।
भिक्षा के लिए गुफा से बाहर कभी न जाते थे।।
जो जन इन के पास दुखी या किसी अर्थ से आते थे।
वे प्रस00 मन होकर अपना शीघ्र इष्‍ट फल पाते थ्‍ो।। 17 ।।
अपने तप साधन हित इनने उत्तरखंड पसंद किया।
वर्ष पच्‍चीस वहां तप जगको फिर उपदेशानंद दिया।।
उच्‍च काय ये परम प्रतापी और दीन दुखी हारी थे।
वर तप धारी पर-उपकारी बनवारी बनवारी थे।।  18 ।।

नेत्र ज्‍योति पाकर एवं दादूजी के दर्शन कर बनवारी दास जी ने दादूजी महाराज से प्रार्थना की कि आप उत्तम उपदेश देकर मुझे कृतार्थ करें। नारायण दास जी ने दादू पंथ परिचय में लिखा है 'तब दादूजी ने बनवारी जी को सिन्‍दुरा राग के चार पद सुनाये जिनका आशय यह था कि जहां हृदय सरोवर में हरिस्‍वरूप जल परिपूर्ण रूप से भरा हो वहीं रमण करते हैं। .........भगवत भजन रूप सुखसागर में स्‍नान करने से अनंत पाप नष्‍ट हो जाते  हैं।........ जो हरि हरि उच्‍चारण करते हैं, निरंतर एक अविनाशी राम को भजते हैं, उनकी बुद्धि रात-दिन उस राम में ही रमण करती है।........ हे प्राणी। गुरूजनों की सेवा करते हुए मन इन्द्रियों के अविषय, अपार, अद्वैत, अविनाशी प्राणाधार, परब्रह्म का सहज स्‍वभाव से सदा ही भजन कर।
द्रव्‍यादि के संचय के संबंध में दादूदयाल जी ने बनवारी दास की जिज्ञासा का उत्तर देते हुए बताया कि द्रव्‍य के‍ लिए कभी झूठ मत बोलो उसे परमार्थ में लगाओ आदि।

 
 

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