Home | Feedback | Contact Us  | Login | Register Now                  

 
 
   Pareek Gaurav
 
 

 
 
Home > Pareek Gaurav > Up to 19th Century > Gopal Das Ji
 
 
बड़े गोपालदास जी
आप पूर्वाश्रम में खांतडि़या पारीक थे तथा जोबनेर निवासी थे। आप गृहस्‍थाश्रम में रहे। आपके लड़के सुवालालजी थे। जब दादूजी महाराज जोबनेर पधारे तो आपने उनका यथोचित स्‍वागत सत्‍कार किया तथा सत्‍संग कराकर दादूजी की वाणी से जनता जनार्दन को ब्रह्म ज्ञान सुलभ कराया। बाद में आप नरायणा (नरेना) चले गए तथा दादूजी के शिष्‍य बन गये। आप दादूजी के 52 शिष्‍यों में से हैं। दादू मंदिर के निर्माण में आपका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है और अंत समय तक आप मंदिर के पुजारी रहे।
आपके जीवन वृत्त को दादू पंथ परिचय के प्रथम भाग में निम्‍न प्रकार दिग्‍दर्शित किया गया है: "सांभर से आमेर जाते समय जब दादूजी अपने शिष्‍यों सहित जोबनेर में पधारे तब दादूजी का आगमन सुनकर वहां का गोपाल भक्‍त अति प्रसन्‍न हुआ और अपने साथियों के साथ दादूजी के सामने अगवानी करने आया और प्रणामादि शिष्‍टाचार के पश्‍चात अति आदर से ले जाकर अच्‍छे स्‍थान पर ठहराया। शिष्‍य मंडली सहित दादूजी की अच्‍छी सेवा की। सेवा से अवकाश प्राप्‍त होने पर श्रद्धा भक्ति सहित दादूजी को प्रणाम करके दादूजी के सामने उपदेश की इच्‍छा लेकर बैठ गया। दादूजी ने उसके मनोभाव को अपनी योगशक्ति से जान लिया और उसके अधिकार के अनुसार उपदेश देने के लिए यह पद बोला-"
सो तत्‍व सहजैं सुषुमन कहना,
सांच पकड़ मन जुग-जुग रहना। ।। टेक ।।
प्रेम प्रीतिकर नीका राखे,
बारंबार सहज नर भाखे। ।। 1 ।।
मुख हिरदय सो सहज संभारे,
तिहिं तत्‍व रहणा कदे न बिसारे। ।। 2 ।।
अंतर सोई नीका जाणे,
निमेष न बिसरे ब्रह्म बखाणे। ।। 3 ।।
सोई सुजाण सुधारस पीवे,
दादू देख जुगे जुग जीवे। ।। 4 ।।
"अर्थ- जिस तत्‍व के विषय में योगियों का कहना है कि सुषुम्‍ना नाड़ी के चलने पर शनै: शनै: साधन की प्रौढ़ावस्‍था में प्राप्‍त होता है। हे मन! तुझे उसी सत्‍य ब्रह्म तत्‍व को प्रतिक्षण पकड़े रहना चा‍हिए। योगी नर प्रीति पूर्वक बारंबार सहजावस्‍था में जाकर अपने हृदय में अच्‍छी प्रकार प्रेम से उसका ध्‍यान करता है और सहज स्‍वरूप का नाम मुख से उच्‍चारण करता है मन में स्‍मरण करता है, उस तत्‍व में वृत्ति रखना कभी भी नहीं भूलता।" "ज्ञान द्वारा संशय विपर्यय रहित अच्‍छी प्रकार बुद्धि में जानता है। एक निमेष मात्र भी उसे भूलता नहीं है। ब्रह्म का ही प्रवचन करता है। वही बुद्धिमान इस प्रकार स्‍मरण सुधा रस का पान करते हुए उस ब्रह्म तत्‍व का साक्षात्‍कार करके ब्रह्म रूप से प्रति युग में जीवित रहता है।"
 
 

Designed By: Manoj Pareek & Vikash Pareek (ARK Web Solution) Copyright ® 2010. PareekPariwar.org  
Home | Pareek Vansh Parichay | Vyaktigat Parichay | Events | Feedback | Contact Us | Privacy Policy | Sitemap