"जगन्नाथ बेटे रामदासजी के पारीक ब्राह्मण कान्हड़कुल (?) में धर्म और भक्ति के मर्यादा हुये। श्री रामानुज सम्प्रदाय के अनुकूल भगवत् शरण होकर मन को लगाया और उपासना के शास्त्र अच्छे प्रकार निज अभिप्राय उपासना का भली प्रकार सब समझा, सार और असार को ऐसा न्यारा-न्यारा कर दिया कि जिस प्रकार हंस दूध और पानी को अलग-अलग कर देता हो, मुनीश्वरों की भांति आचार व धर्म का आचरण करते थे, और अन्याय शरणागति व दश प्रकार की भक्ति के करने वाले दृढ़ हुए। पुरषोत्तम ने अपने गुरु के प्रताप से दोनों अंग में कवच, जिसको वख्तर कहते हैं, पहिना था, इसके अर्थ कई भांति के हैं-" प्रथम यह कि यह महाराज पुरोहित राजा के थे और शूरता-वीरता-विख्यात, सो एक जो शरीर है उसमें वख्तर पहिना करते थे, जैसा सिपाई लोग पहिनते हैं और दूसरा अंग जो मन है जिसमें सहिष्णुता और क्षमा का वख्तर धारण थ कि किसी की कठोर वाणीरूपी शस्त्र न लगे।