Home | Feedback | Contact Us  | Login | Register Now                  

 
 
   Pareek Gaurav
 
 

 
 
Home > Pareek Gaurav > Up to 19th Century > Jagannath Ji Pareek
 
 
भक्‍त श्री जगन्‍नाथजी पारीक
पारीक कुल में जैसे भक्ति-नभ का चमकीला सितारा करमेती बाई हुई हैं वैसे ही पुरोहित जगन्‍नाथ जी परम भगवद् भक्‍त और परचाधारी ज्ञानी हुए हैं। इनका वृत्तांत भगवद्भक्‍तों का वर्णन करने वाले भक्‍तमाल-ग्रन्‍थों में जैसे दिया हुआ है, वह प्रस्‍तुत है।
(1) भक्‍तकल्‍पद्रुम भक्‍तमाल में 20वीं निष्‍ठा में।
"जगन्‍नाथ बेटे रामदासजी के पारीक ब्राह्मण कान्‍हड़कुल (?) में धर्म और भक्ति के मर्यादा हुये। श्री रामानुज सम्‍प्रदाय के अनुकूल भगवत् शरण होकर मन को लगाया और उपासना के शास्‍त्र अच्‍छे प्रकार निज अभिप्राय उपासना का भली प्रकार सब समझा, सार और असार को ऐसा न्‍यारा-न्‍यारा कर दिया कि जिस प्रकार हंस दूध और पानी को अलग-अलग कर देता हो, मुनीश्‍वरों की भांति आचार व धर्म का आचरण करते थे, और अन्‍याय शरणागति व दश प्रकार की भक्ति के करने वाले दृढ़ हुए। पुरषोत्तम ने अपने गुरु के प्रताप से दोनों अंग में कवच, जिसको वख्‍तर कहते हैं, पहिना था, इसके अर्थ कई भांति के हैं-" प्रथम यह कि यह महाराज पुरोहित राजा के थे और शूरता-वीरता-विख्‍यात, सो एक जो शरीर है उसमें वख्‍तर पहिना करते थे, जैसा सिपाई लोग पहिनते हैं और दूसरा अंग जो मन है जिसमें सहिष्‍णुता और क्षमा का वख्‍तर धारण थ कि किसी की कठोर वाणीरूपी शस्‍त्र न लगे।
(2) दूसरा यह कि दोनों अंग जो दोनों भुजा तिस पर शंख और चक्र के चिन्‍ह धारण करके कलियुग के पा जो तीर व तलवार के सदृश हैं, उनसे शरीर की रक्षा किया। (3) तीसरा यह कि प्रगट अंग में भगवत् सेवा का ऐसा कवच पहिना था कि संसारी कार्य, जो तीर व तलवार से भी अति तीक्ष्‍ण हैं कदापि नहीं काम कर सके थे और हृदय में भगवत्-चितवन रूपी कवच पहिना था कि जिस करके दूसरी चिन्‍तारूपी शस्त्र स्‍पर्श नहीं कर सकता था।"
टीप- इससे इनका पारीक कुल में कांथडि़या खांप में उत्‍पन्‍न होना और पुरुषोत्तम गुरु और रामदास पिता तथा पण्डित और शस्‍त्रधारी वीर होना साथ ही परम भागवत् और रामानुज मतानुयायी होना भी प्रगट हुआ। कान्‍हड़ कुल यह शब्‍द कांथडि़या कुल का भ्रष्‍टरूप उल्‍थाकार ने किया है जैसे कि आगे प्रमाण से प्रगट होगा।
 
 

Designed By: Manoj Pareek & Vikash Pareek (ARK Web Solution) Copyright ® 2010. PareekPariwar.org  
Home | Pareek Vansh Parichay | Vyaktigat Parichay | Events | Feedback | Contact Us | Privacy Policy | Sitemap