मुनिजनों की सी सदाचार वृत्ति धारण कर, श्री लक्ष्मी सम्प्रदाय में परम प्रकाशमान हुए और साधुस्वभाव अनन्यशरणागत, दशधा(प्रेम) भक्ति में परम प्रवीण हुए। अपने श्री गुरु पुरुषोत्तम जी की कृपा से बाह्यान्तर दोनों अंगों में वर्म (वख्तर) धारण किया अर्थात् आप राजा के पुरोहित शूरवीर विख्यात थे इससे प्रगट शरीर में कवच पहनते थे, दूसरा सूक्ष्म अंतर अंग में क्षमा सहिष्णुता भक्ति का कवच पहिना जिसमें अंतर शत्रुओं के शस्त्र आपको न लगे। और दोनों भुजाओं पर भगवादायुध छाप तथा सूक्ष्म अन्तर अंग में श्री चरण चिन्ह ध्यान भी कलि के शास्त्रों के लिए कवच थे, सो सब धारण किए।