परसराम जी की उम्र काफी हो गई थी(शायद 40-50 साल के) उस समय उनके संतान नहीं हुई थी, इस दु:ख से दु:खी होकर वे अपनी 'कुल देवी कुंजल माता' की यात्रा, संतान की इच्छा से करने को कटिबद्ध हुए और स्त्री सहित 'जायल नगरी'(इलाका मारवाड़) के लिए रवाना हुए। यहां तक प्रतिज्ञा कर चुके थे कि या तो माता संतान का वर दे देंगी नहीं तो इस शरीर को मातो के बलि चढ़ा देंगे। चलते-चलते रास्ते में जायल नगरी से इस तरफ कुछ रात रहे परसराम जी हाथ मुंह धोने को निकले थे और माता जी का गहरा ध्यान लगाये हुए थे। प्रात:काल की कुछ सफेदी पूर्व दिशा में झलकने लगी थी। आकाश में तारों का प्रकाश हो रहा था, शीतल मंद पवन बह रही थी। ऐसे सुंदर समय में सामने से एक दीप्तिमान दिव्य स्त्री का उन्हें आभास हुआ। दर्शन से चित्त प्रसन्न हुआ। उस प्रकाशमान मूर्ति ने पूछा 'तू कहां जाता है' परसराम जी ने अपने मनोरथ को बड़े आर्तस्वर से कहा कि मैं अभागा हूं, मेरे संतान नहीं होती सो अब कुल देवीजी को अपनी बलि देने जा रहा हूं। उनकी मर्जी होगी तो मुझे सभागा कर देंगे नहीं तो जीकर क्या करना है? इतना सुनकर उस देवी ने वरदान दिया कि 'जा तेरे चार पुत्र होंगे' यह सुनकर प्रसन्न हुए और अपनी स्त्री का, घर गृहस्थी का विचार करके बड़ी नम्रता से कहा कि इतना वरदान हुआ तो क्या एक कन्या भी होनी चाहिए और वह आप जैसी हो।