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   Pareek Gaurav
 
 

 
 
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भक्‍त कर्मेती (बाई)
पारीक कुल तिलक 'कर्मेती बाई' कां‍थड़‍िया पुरोहित 'परसाराम जी खण्‍डेले वालों' (तत्‍कालीन राज्‍य जयपुर, राजपूताना) की पुत्री सन् 1600 की शताब्‍दी में हुई। बाल्‍यावस्‍था से भगवान की भक्ति हृदय में जम गई थी। इनकी इच्‍छा के विपरीत विवाह हुआ। गौना(दिवरागमन) के समय घर चली गई। एक ऊंट के खाली खोखरे में तीन दिन तक छिपी रही। पीछा करने वालों का भय मिट जाने पर निकल कर किसी गंगाजी जाने वाले के साथ जाकर गंगा स्‍नान किया। फिर वृन्‍दावन चली गई। पिता को पता लगा तो उन्‍हें लाने वो वृन्‍दावन पहुंचे परन्‍तु बहुत समझाने पर भी वे नहीं आई वरन् पिता को भक्ति का उपदेश दिया और राधाकुण्‍ड से निकाल कर भगवान 'बिहारी जी' की मूर्ति सेवा को देकर पिता को विदा किया। पिता घर आकर मूर्ति की सेवा करने लगे ओर इसमें तल्‍लीन हो गये। खण्‍डेला के राजा ने इनकी भक्ति की प्रगाढ़ता देखी व कर्मेतीजी की भक्ति की इतनी महिमा सुनी कि वृंदावन गये और वहां कर्मेतीजी के लिए खण्‍डेला राजा जी ने ब्रह्मघाट(ब्रह्मकुण्‍ड) पर एक कुंज कुटी बनवा दी जिसका निशान अब भी है। बिहारी जी का एक अच्‍छा मंदिर खण्‍डेला में विद्यमान है। उसकी सेवा परशुराम जी के वंशज करते हैं जो इस ही कारण से 'बिहारी जी' कहलाते हैं। मंदिर के भोग, राग और निर्वाह के निमित्त 12 कोठियों की आजीविका खण्‍डेला, सीकर आदि स्‍थानों में हैं। कर्मेती बाई ने आचार से रहने को परशुराम जी से कह दिया था सो प्रथा बहुत समय तक चली परन्‍तु अब ढीली पड़ गई।
पारीक पुरोहितों के राव भाटों के पास इन कर्मेती बाई का काफी हाल है तथा परसराम जी के वंशज बिहारीजी वालों के पास भी इनका वृत्तांत है। भक्‍तमालों में जो कुछ लिखा है वह उसका वृत्तांत तो आगे चलकर लिखा ही जायेगा परन्‍तु इन दोनों स्रोतों से जो कुछ जाना गया उसका संक्षिप्‍त यहां दिया जाता है।
परसराम जी की उम्र काफी हो गई थी(शायद 40-50 साल के) उस समय उनके संतान नहीं हुई थी, इस दु:ख से दु:खी होकर वे अपनी 'कुल देवी कुंजल माता' की यात्रा, संतान की इच्‍छा से करने को कटिबद्ध हुए और स्‍त्री सहित 'जायल नगरी'(इलाका मारवाड़) के लिए रवाना हुए। यहां तक प्रतिज्ञा कर चुके थे कि या तो माता संतान का वर दे देंगी नहीं तो इस शरीर को मातो के बलि चढ़ा देंगे। चलते-चलते रास्‍ते में जायल नगरी से इस तरफ कुछ रात रहे परसराम जी हाथ मुंह धोने को निकले थे और माता जी का गहरा ध्‍यान लगाये हुए थे। प्रात:काल की कुछ सफेदी पूर्व दिशा में झलकने लगी थी। आकाश में तारों का प्रकाश हो रहा था, शीतल मंद पवन बह रही थी। ऐसे सुंदर समय में सामने से एक दीप्तिमान दिव्‍य स्‍त्री  का उन्‍हें आभास हुआ। दर्शन से चित्त प्रसन्‍न हुआ। उस प्रकाशमान मूर्ति ने पूछा 'तू कहां जाता है' परसराम जी ने अपने मनोरथ को बड़े आर्तस्‍वर से कहा कि मैं अभागा हूं, मेरे संतान नहीं होती सो अब कुल देवीजी को अपनी बलि देने जा रहा हूं। उनकी मर्जी होगी तो मुझे सभागा कर देंगे नहीं तो जीकर क्‍या करना है? इतना सुनकर उस देवी ने वरदान दिया कि 'जा तेरे चार पुत्र होंगे' यह सुनकर प्रसन्‍न हुए और अपनी स्‍त्री का, घर गृहस्‍थी का विचार करके बड़ी नम्रता से कहा कि इतना वरदान हुआ तो क्‍या एक कन्‍या भी होनी चाहिए और वह आप जैसी हो।
 
 

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