जो मूर्ति बिहारी जी की कर्मेती बाई ने अपने पिता को दी थी वह अब तक खण्डेले में बिहारी जी की कहाती है और विराजमान है, इसके पिता ने चिन्ह मांगा तथा तब राधाकुण्ड में डुबकी लगाकर कर्मेती ने लाकर अपने पिता को दी थी। परन्तु प्रिया जी की मूर्ति लाने को फिर डुबकी लगाई और देर हो गई बाहर नहीं निकली तो मूर्ति कुछ छोटी आई, उस पर पिता से कहा कि आपने बड़ी उतावली करके काम बिगाड़ दिया। प्रियाजी की भी उतनी ही बड़ी मूर्ति मिलती यदि कुछ और इन्तजार करते और घबराते नहीं यह बात बिहारी जी वालों में प्रसिद्ध है।