खोजी जी के ध्यान और तपस्या से शंकित होकर माता-पिता ने बाल्यावस्था में ही खोजी जी का विवाह कर दिया था। ब्याह के समय खोजी जी की अवस्था केवल ग्यारह वर्ष की थी। ब्याह हो जाने के दूसरे वर्ष अर्थात् बारह वर्ष की उम्र में खोजी जी "ईटाखोई" ग्राम के कई स्नानार्थी, पुरुषों के साथ श्री गंगा स्नान के लिए हरद्वार को रवाना हुए। माता-पिता ने बहुत छोटी उम्र जानकर लोगों को ताकीद कर दी कि बालक की निगहवानी रखें और रास्तें में तकलीफ न होने दें। यह यात्रा गांव 'ईटाखोई' से मध्याह्न को शुरू हुई। उसके आगे दो कोस चलकर गांव धानणी के तालाब पर मुकाम हुआ और सबने निश्चय किया कि रातभर यहां व्यतीत करके प्रात:काल स्नान ध्यान कर फिर यात्रा करेंगे। दूसरे दिन प्रात:काल जब कि सब साथी लोग स्नान करने को तालाब पर चले गये, उस समय दो ब्राह्मण कन्याएं घड़ों में जल लाकर बालक चतुर्भुज से बोली 'महाराज स्नान करिये'। उस समय बालक खोजी जी ने कहा आप लोग कौन हैं, और स्नान कराने के लिए यहां आने का मतलब क्या है? तब उन कन्याओं ने उत्तर दिया कि 'हम दोनों गंगा यमुना हैं, आप भगवद् भक्त हो, बाल्यावस्था के कारण हमारे पास पहुंचने में तकलीफ होगी, इसी से भगवान की आज्ञानुसार आपको स्नान कराने के लिए आई हैं। आपको अब आगे जाना नहीं पड़ेगा, स्नान कीजिये।'