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यह बात सुनकर बालक खोजी जी को हर्ष के साथ-साथ आश्‍चर्य भी हुआ। उन्‍होंने कहा कि मेरी इच्‍छा सर्वदा गंगा-जल से स्‍नान करने की है। इस पर कन्‍याओं ने कहा कि, अच्‍छार तुम्‍हारे लिए सर्वदा स्‍नान का भी प्रबन्‍ध हो जाएगा। भविष्‍य में तुम्‍हारा स्‍थान पालड़ी (मारवाड़) ग्राम में होगा। वहां से होकर एक कोस पर खार जमता है। वहां जाकर तुम गंगा-स्‍मरण करना, स्‍मरण मात्र से ही वहां तुम्‍हें गंगा दर्शन होगा, क्‍योंकि वह स्‍थान ऐतिहासिक है। महाराज परीक्षित के पुत्र जनमेजय के यज्ञ में तीर्थों का अवशिष्‍ट जल कलश में रखकर वहां ही गाड़ दिया गया था।
उसी जल से गंगा का दर्शन होगा, और वहां ही तुम्‍हारी सद्गति होगी। इस पर खोजी जी ने कहा कि खैर मेरे स्‍नान का प्रबन्‍ध तो हुआ पर हरद्वारा जाना जरूरी है, क्‍योंकि जो हमारे पूर्वजों की अस्थि जो मैं बटुए में लाया हूं, उसे हरि की पेड़ी पर ले जाना है, सो इसके लिए जाना ही पड़ेगा। तब उन कन्‍याओं ने कहा कि अस्थि का बटुआ यहां ही तालाब में डाल दो। वहां हरिद्वार में हरिकी पेडी पर यह बटुआ तुम्‍हारे साथियों को मिल जाएगा। यह बात उन्‍हें समझा दो। इस बात को सुनकर खोजी जी निरुत्तर हो गये और उन कन्‍याओं के लाये हुए जल से स्‍नान किया। स्‍नान के अनन्‍तर वे कन्‍याएं भी अदृश्‍य हो गईं।
बालक खोजी जी ने बटुवे को तो तालाब में डाला और उसे हरि की पेड़ी पर मिलने की बात बताकर साथियों को को आगे रवाना कर दिया और आप वापिस अपने गांव "ईटाखोई" पहुंचे।
अपने गांव के बाहर पहुंच कर खोजी जी ने घरवालों को सूचना दी कि "मैं तीर्थ स्‍नान करके आ गया हूं, मुझे वंदना कराने को आईये।" मारवाड़ में यह प्रथा है कि जो तीर्थ यात्रा करके आवे, उसे गाजे-बाजे के साथ गांव के अन्‍दर लाते हैं और उसके पास जो तीर्थजल होता है उसकी वंदना करते हैं, इसी का नाम वन्‍दना है। यह बातें सुनकर गांव के कतिपय व्‍यक्ति चेतनदास जी के पास जाकर हंसी करने लगे कि, आपका लड़का एक ही दिन रात में गंगा-स्‍नान कर आया है, वन्‍दना के लिये चलिये। वास्‍तव में इन बातों से पिता चेतनदास जी को भी भ्रम हुआ और वे पहिले पथवारी के पास गए-('पथवारी' की रस्‍म मारवाड़ प्रदेश में की जाती है। इसकी विधि यह है कि गांव में एक सुरक्षित स्‍थान में यात्रा के समय यव (जौ) बो दिया जाता है, घर वाले प्रतिदिन उसे जल से सिंचन करते हैं। अगर यव जम आया और अच्‍छी प्रकार हरा भरा रहा तो, इससे इस बात की परीक्षा होती है कि तीर्थ-यात्रा करने वाला मार्ग में सुखपूर्वक है, और सकुशल वापिस आ रहा है। यदि यह मलीन हुए या सूख जाएं तो यात्री को दु:ख और विध्‍न की आशंका की जाती है। इसी का नाम 'पथवारी' है।)
पथवारी के पास जाकर चेतनदास जी ने देखा कि खोजी के उद्देश्‍य से जो यव यात्रा के दिन बोए गये थे वे एक हाथ ऊंचे उग आए हैं, और अन्‍य यात्रियों के यव में अभी अंकुर भी नहीं निकला है। इससे सब लोगों का भ्रम दूर हो गया, और गांव वाले सभी बड़े प्रेम से बाल खोजी जी को गाजे-बाजे के साथ ग्राम में लाये। माता-पिता ने गंगाजली की पूजा कराकर अति उत्‍साह में न्‍यात और ब्राह्मणों को भोजन कराया, और गंगाजल जो खोजी जी जाये थे, वह सबको प्रदान किया। उधर, साथी यात्री लोग हरिद्वार पहुंचे। उन्‍हेंने देखा कि वही बटुवा जो खोजी जी ने तालाब में डाल दिया था, हरि की पेड़ी पर मौजूद है। इससे उन लोगों को भी विश्‍वास हो गया, वे लोग भी स्‍नान ध्‍यान पूर्वक गंगा में अस्थियों का प्रवाह करके करीब दो महीने में वापस आये और खोजी जी के चमत्‍कार का वर्णन करने लगे।
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