अपने गांव के बाहर पहुंच कर खोजी जी ने घरवालों को सूचना दी कि "मैं तीर्थ स्नान करके आ गया हूं, मुझे वंदना कराने को आईये।" मारवाड़ में यह प्रथा है कि जो तीर्थ यात्रा करके आवे, उसे गाजे-बाजे के साथ गांव के अन्दर लाते हैं और उसके पास जो तीर्थजल होता है उसकी वंदना करते हैं, इसी का नाम वन्दना है। यह बातें सुनकर गांव के कतिपय व्यक्ति चेतनदास जी के पास जाकर हंसी करने लगे कि, आपका लड़का एक ही दिन रात में गंगा-स्नान कर आया है, वन्दना के लिये चलिये। वास्तव में इन बातों से पिता चेतनदास जी को भी भ्रम हुआ और वे पहिले पथवारी के पास गए-('पथवारी' की रस्म मारवाड़ प्रदेश में की जाती है। इसकी विधि यह है कि गांव में एक सुरक्षित स्थान में यात्रा के समय यव (जौ) बो दिया जाता है, घर वाले प्रतिदिन उसे जल से सिंचन करते हैं। अगर यव जम आया और अच्छी प्रकार हरा भरा रहा तो, इससे इस बात की परीक्षा होती है कि तीर्थ-यात्रा करने वाला मार्ग में सुखपूर्वक है, और सकुशल वापिस आ रहा है। यदि यह मलीन हुए या सूख जाएं तो यात्री को दु:ख और विध्न की आशंका की जाती है। इसी का नाम 'पथवारी' है।)