गृहस्थ में रहते हुए भी आप सदैव भगवद् भक्ति में लीन रहते थे। आपकी तपस्थली ग्राम खण्डेला में स्थित "मूनंका की बावड़ी" थी जहां वे रहते थे। दिन में एक बार घर भोजन करने को आते थे। दिन भर में एक रोटी एक लोटा पानी एक ही बार पीते थे तथा अंगवस्त्र भी एक ही धारण करते थे। तथा एक ही वस्त्र का औढ़ना बिछौना था।