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ज्ञानचूड़ जी बोहरा
ज्ञानचूड़ जी संभवत: पहले पारीक थे जिन्‍होंने देश विदेश में भ्रमण कर पारीक जाति के गोत्रादि की गणना की व जाति गंगा की सेवार्थ कार्य किया। ज्ञानचूड़ जी के संबंध में अधिक जानकारी उपलब्‍ध नहीं है। आप तावण्‍या मिश्र (बोहरा) थे। पारीक जाति के तत्समय0 कितने आस्‍पद, कितने गोत्र और कितनी शाखायें विद्यमान हैं इसकी खोज कर, इनके सम्‍बंध में आपने सही आंकड़े एकत्रित किये। पारीक्ष ब्राह्मण के अनुसार यह निश्चित किया गया कि-
''संवत् 1300 वि. के आरंभ में तावण्‍या मिश्र (पारीक्षों की वत्‍स गोत्र की शाखा) श्री ज्ञानचूड़ जी ने संसार भ्रमण करके पता लगाकर यह निश्‍चय किया था कि पारीकों के 9 आस्‍पद, 12 गोत्र और 108 शाखाएं विद्यमान हैं।''
ज्ञानचूड़ जी द्वारा तत् समय यह जानकारी प्राप्‍त करना कितना कठिन कार्य रहा होगा इसकी मात्र कल्‍पना ही की जा सकती है। उस समय यातायात के साधन एवं संचार माध्‍यम नगण्‍य थे। एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान की दूरी तय कर पाना अपने आप में एक श्रमसाध्‍य एवं दुरूह कार्य था। तन, मन और धन से जाति सेवा कर एक ऐसा अनूठा एवं अद्वितीय उदाहरण आदरणीय ज्ञानचूड़ जी ने प्रस्‍तुत किया जिसकी तुलना नहीं की जा सकती है संवत् 1300 में हमारी जाति के आस्‍पदों, गोत्रों एवं शाखाओं की जो गणना की गई थी उसमें शाखाओं के अतिरिक्‍त कोई अंतर नहीं आया है और पारीक जाति के 12 गोत्र एवं 103 शाखायें आज भी यथावत् विद्यमान है।
   
 

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