बहुराजी के अनुसार सन् 1964 ई. में राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (जहां वो सेवारत थे) के काम से उनका बीकानेर जाना हुआ तब वे श्री बद्रीनारायण जी व्यास से मिले थे। बद्रीनारायण जी व्यास हरिद्विज जी और उनके भ्राता हरिदेव जी तथा अन्य वंशजों द्वारा संप्रहीत एवं रचित पाण्डुलिपियों के एक सौ से ऊपर बस्ते बहुरा जी को दिखाये जो उनके बैठने के कक्ष में ऊपर टांडों पर क्रमवार रखे हुए थे। व्यास जी ने बहुरा जी को अपना वंश वृक्ष भी दिया, जिसकी उन्होंने प्रतिलिपि करवा ली थी। इससे विदित होता है कि इस वंश के मूल पुरुष श्री ज्योतिस्वरूप जी गोलवाल व्यास थे, जिनका जन्म विक्रम संवत् 1330 में (मेडता में?) हुआ था। वे बड़े तपस्वी, योगी और सिद्ध थे। उनके द्वारा दिये हुए अर्घ्य को ग्रहण करने के लिए स्वयं सूर्यदेव उपस्थित होते थे। उनकी सभा में देवता भी तत्वज्ञान-लाभार्थ आया करते थे।