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विद्वद्वन्‍धु हरिद्विज और हरिदेव व्‍यास
श्री गोपालनारायण जी बहुरा का एक लेख हरिद्विज जी एवं हरिदेव जी व्‍यास के सम्‍बन्‍ध में 'पारीक दर्पण' बीकानेर के वर्ष 2 अंक 8-9 सितम्‍बर अक्‍टूबर 1983 के अंक में पृष्‍ठ 5 पर मुद्रित हुआ था। बहुरा जी ने उक्‍त व्‍यास बंधुओं के सम्‍बन्‍ध में जो जानकारी कराई इसके अनुसार—
विद्वद्वर्य स्‍तोत्रप्रणेता हरिद्विज व्‍यास के विषय में सन् 1963 में बीकानेर से प्रकाशित और विद्वद्वरेण्‍य स्‍व. विद्याधरजी शास्‍त्री द्वारा सम्‍पादित 'विश्‍वम्‍भरा' के किसी अंक में छपा था। उसी अंक में ललित और प्राञ्जल संस्‍कृत में प्रणीत मेडतावास्‍तव्‍य हरिदेव द्वारा विक्रमपुर से योधपुराधीश श्रीमदजितसिंह के नाम प्रेषित विज्ञप्तिलेख (विचित्रपत्र) भी प्रकाशित हुआ था। उसी से यह ज्ञात हुआ कि हरिद्विज मेड़तानिवासी पारीककुल में उत्‍पन्‍न हुए थे और बालक महाराजा अजीतसिंह के वीरवर दुर्गादास राठौड़ के संरक्षण में अज्ञातवास के समय उन्‍होंने यह पत्र किसी विशेष दूत के हाथ भेजा था।
बहुराजी के अनुसार सन् 1964 ई. में राजस्‍थान प्राच्‍य विद्या प्रतिष्‍ठान, जोधपुर (जहां वो सेवारत थे) के काम से उनका बीकानेर जाना हुआ तब वे श्री बद्रीनारायण जी व्‍यास से मिले थे। बद्रीनारायण जी व्‍यास हरिद्विज जी और उनके भ्राता हरिदेव जी तथा अन्‍य वंशजों द्वारा संप्रहीत एवं रचित पाण्‍डुलिपियों के एक सौ से ऊपर बस्‍ते बहुरा जी को दिखाये जो उनके बैठने के कक्ष में ऊपर टांडों पर क्रमवार रखे हुए थे। व्‍यास जी ने बहुरा जी को अपना वंश वृक्ष भी दिया, जिसकी उन्‍होंने प्रतिलिपि करवा ली थी। इससे विदित होता है कि इस वंश के मूल पुरुष श्री ज्‍योतिस्‍वरूप जी गोलवाल व्‍यास थे, जिनका जन्‍म विक्रम संवत् 1330 में (मेडता में?) हुआ था। वे बड़े तपस्‍वी, योगी और सिद्ध थे। उनके द्वारा दिये हुए अर्घ्‍य को ग्रहण करने के लिए स्‍वयं सूर्यदेव उपस्थित होते थे। उनकी सभा में देवता भी तत्‍वज्ञान-लाभार्थ आया करते थे।
इन्‍हीं ज्‍योतिस्‍वरूप जी की वंश परंपरा में विक्रम संवत् 1672 में गंगाराम जी उत्‍पन्‍न हुए थे जिनके चार पुत्र गोपीनाथ, नवलराम, हरिद्विज और हरिदेव थे। हरिद्विज और हरिदेव दोनों ही प्रकांड विद्वान एवं काव्‍यकर्ता थे। श्री बद्रीनारायण जी ने हरिद्विजजी की निम्‍न रचनाओं की सूची बहुरा जी को लिखाई-
 
 

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