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इससे स्‍पष्‍ट वंशप्रणाली यहां विदित होती है-
1. उदयकरण, 2. बालो, 3. मोकलसी, 4. रायमल, 5. सूजा, 6. लूणकरण, 7. राव मनोहर, 8. रायचन्‍द, 9. तिलोकचन्‍द, 10. आनन्‍द, 11. अमरचन्‍द, 12. जगतसिंह, 13. सकतसिंह, 14. जसवन्‍त सिंह, 15. नाथ सिंह, 16. विसनसिंह, 17. हनुवन्‍तसिंह, 18. लिछमणिसिंह, 19. बलदेव सिंह, 20. स्‍योनाथसिंह, 21. प्रतापसिंहजी।
इस वंशावली में संख्‍या 9 पर तिलोकचन्‍द जी राव मनोहर जी के पोते के समय पुरोहित हरिवंशजी हुये। जो बड़े शूरवीर, धनाढ्य, ज्ञानी और यशस्‍वी थे। इनका सम्‍मान रावजी ही के पास नहीं था अपितु आमेर के महाराजा भी इनका काफी सम्‍मान करते थे। ये राव जी के साथ जब भी दिल्‍ली आदि स्‍थानों पर जाते इनकी बुद्धिमानी और वीरता की प्रशंसा होती थी। इनकी निगरानी व देख रेख ही से राज्‍य के बड़े-बड़े काम हुए। मनोहरपुर का श्री चतुर्भुज जी का मन्दिर इन्‍हीं ने बनवाया और इन्‍हीं को पीछे मिला बताया। नीचे लिखे शिलालेख से उक्‍त बात सिद्ध होती है:
"सम्‍वत् 1674 मंगशिर सुदी 7 आदित्‍यवासरे पुष्‍यनक्षत्रे श्री चतुर्भुज जी का दिवाला को प्रारम्‍भ कियो महाराव जी श्री पृथीचन्‍दजी के राज्‍य संवत् 1680 चैत्र सुदी 9 आदित्‍यवार पुष्‍य माह श्री ठाकुर पाट प्रति बैठ्या आग्‍या प्रोहित हरिवंश ने हुई शुभम्। महाराव श्री तिलोकचन्‍द जी के राज्‍य सम्‍पूर्ती हुवो लिखितं जोसी छीतर विश्‍वकर्मा तालू सिलावट आंबैरिका":-

इससे इस मन्दिर का 6-7 वर्ष में तैयार होना, पृथीचन्‍द जी के समय में प्रारंभ होकर तिलोकचन्‍द जी के समय में सम्‍पूर्ण होना और हरिवंश जी की प्रधानता उनको मिलने का पता लगता है।

इनके पास धन की इतनी विपुलता थी कि बड़े-बड़े जागीरदार इनसे रुपये उधार लेते थे। एक दिन इनकी माता ने कौतुहल वश कहा कि बेटा मैंने एक लाख रुपया इकट्ठा नहीं देखा। इस पर आपने हंस कर कहा कि माताजी यह क्‍या बड़ी बात है। शुभ नक्षत्र में एक लाख रुपये का चबूतरा चुनवा कर उस पर मखमल की गादी पर अपनी प्‍यारी जननी को विराजमान करके उनसे प्रार्थना की कि अब इसका पुण्‍यार्थ संकल्‍प कर दीजिये। पण्डित को बुलवा कर यथाविधि संकल्‍प कराकर उक्‍त धन राशि का दान करा दिया। कहते हैं कि इस रुपये में इनके उदिक के गांव "मामटोरी" का शिवालय, शिखरबन्‍द मन्दिर और जोड़ा (तालाब) खुदवाया और बनवाया गया। इस तालाब का नाम हरसागर है जिसके दो अर्थ होते हैं। यह ग्राम मामटोरी और कुछ अन्‍य गांव और भूमि इनको राज्‍य से उदिक (पुण्‍यार्थ) मिले थे।
 
 

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