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हृदय राम जी
हृदय राम जी पूर्वाश्रम में पारीक-तिवाड़ी थे। आप गौनेर (जयपुर) निवासी थे। आप दादूजी के शिष्‍य थे तथा सिमाणे में अपने गुरु आदूरामजी के पास रहते थे। इन्‍होंने आदूजी की चद्दर नहीं ओढ़ी थी अपितु अलग रहकर ही स्‍थान बनाया था। इनके संबंध में दादूपंथ परिचय में लिखा है कि "हृदय राम जी आदूजी महाराज की शिष्‍य परंपरा में ध्‍यानदास जी के शिष्‍य थे। हृदय राम जी ने दादूजी महाराज के शिष्‍यों की नाम माला लघु ग्रंथ लिखा है। इसमें इन्‍होंने शिष्‍यों की संख्‍या निम्‍न दोहे में बताई है।
गुरु दादू घर अवतरे, दौ सै सत्तर शिष्‍य।
प्रकट भये सु प्रसिद्ध सभी, देव मुनिश्‍वर ऋष्‍य।।
इस ग्रंथ में 46 पद्य हैं। उनमें 270 शिष्‍यों के नामों की गणना है। उन्‍होंने अपना परिचय भी एक दोहे में दिया है वह इस प्रकार है-
ध्‍यानदास गुरु की कृपा, संतों शरणे आंहि।
हृदय राम भाषा रची, नगर सिमाणे मांही।।
   
 

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