मत्स्येन्द्र-शावर, -आनन्द भैरव-चौरंगी, मीननाथ-गौरक्षनाथ, विरूपाक्षनाथ-विलेशय-मन्थान-भौरव-सिद्ध-बुद्च, कन्थडि कोरंटकसुरानंद विद्धपाद-चर्पटी-कानेरी-पूज्यपाद-नित्यनाथ-निरंजन-कपाली-विन्दुनाथ-काकचण्डीश्वर-अल्लाम-प्रभुदेव-घोड़ा चोल(या एक ही नाम घोड़ा बोली-टिंटिणीं-मानुकी-नारदेव-खण्ड-कापालिक। इनको प्रधान मानकर तारानाथ आदि महासिद्ध योगी हठयोग के साधन से ब्रह्मांड में योग बल से कालदंड मृत्यू को जय करके (सूक्ष्म शरीर से) विचरते हैं। अर्थात् अपनी इच्छा में जहां चाहते हैं वहीं चले जाते हैं।