Pareek Gaurav
 
 

 
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श्री आदिनाथमत्‍स्‍येन्‍द्रशावरानन्‍द भैरवा:।
चौरंगी मीनगोरक्षविरूपाक्षविलेशया:।।5।।
मन्‍थानो भैरवो योगी सिद्धिर्बुद्धश्‍च कं‍‍थडि:।
कोरटक: सुरानंद: सिद्धपादक्ष: चर्पटि:।।6।।
कानेरी पुज्‍यपादश्‍च नित्‍यनाथो निरंजन:।
कापाली विन्‍दुनाथश्‍च काकचण्‍डश्चिराह्वय:।।7।।
अल्‍लाम: प्रभुदेवश्‍च घोडाचोली च टिंटिणि:।
मानुकी नारदेवश्‍च खण्‍ड; कापालिकस्‍तथा।।8।।
इत्‍यादयो महासिद्धा हठयोगप्रभावत:।
खण्‍डयित्‍वा कालदेहं ब्रह्मांडे विचरंति दे।।9।।
हठयोग के सिद्धों की शिष्‍य परंपरा आदिनाथ श्री शिवजी से है। उनके इस योग के प्रधान शिष्‍य इस कलियुग में मत्‍स्‍येन्‍द्रनाथ हुये। मत्‍स्‍येन्‍द्र के अनेक शिष्‍य हुए। इन श्‍लोकों में जिन बाधो के नाम आए वे इस प्रकार हैं:-
मत्‍स्‍येन्‍द्र-शावर, -आनन्‍द भैरव-चौरंगी, मीननाथ-गौरक्षनाथ, विरूपाक्षनाथ-विलेशय-मन्‍थान-भौरव-सिद्ध-बुद्च, कन्‍थडि कोरंटकसुरानंद विद्धपाद-चर्पटी-कानेरी-पूज्‍यपाद-नित्‍यनाथ-निरंजन-कपाली-विन्‍दुनाथ-काकचण्‍डीश्‍वर-अल्‍लाम-प्रभुदेव-घोड़ा चोल(या एक ही नाम घोड़ा बोली-टिंटिणीं-मानुकी-नारदेव-खण्‍ड-कापालिक। इनको प्रधान मानकर तारानाथ आदि महासिद्ध योगी हठयोग के साधन से ब्रह्मांड में योग बल से कालदंड मृत्‍यू को जय करके (सूक्ष्‍म शरीर से) विचरते हैं। अर्थात् अपनी इच्‍छा में जहां चाहते हैं वहीं चले जाते हैं।
यहां प्रयोजन कंथड़ व कन्‍थडि(ऋषि या महासिद्ध) से है जो छठे श्‍लोक में आया है। ऐसा नाम अन्‍यत्र दृष्टिगोचर न होने से यही प्रतीत होता है कि कां‍थडि़यों के आदि पुरुष यही हों क्‍योंकि उनको ऋषि की पदवी योग के बिना मिल ही कैसे सकती थी। परन्‍तु इनका विशेष वृत्तांत न तो योग ग्रंथों में ही मिलता है न राव, भाटों की पौथियों में।
यदि यही कंथड ऋषि कां‍थडियों के मूल पुरुष हुए हों तो वे अवश्‍य गृहस्‍थ भी रहे होंगे तब ही उनकी संतान आगे चली। पूर्व में ऋषि और योगी लोग प्राय: सस्‍त्रीक ही होते थे। वशिष्‍ठ, पराशर, यज्ञवल्‍क्‍य, जनक आदि के चरित्रों से ऐसा ही प्रमाणित होता है।
'कंथडि' नाम के इस प्रकार मिल जाने से हमने यह अनुमान किया है क‍ि कां‍थडिया शब्‍द की व्‍युत्‍पत्ति ऐसे ही 'कंथड' शब्‍द से होती हो। एक बात इस अनुमान की पुष्टि में और भी दी जा सकती है कि कंथड ऋषि के थोड़े ही अंतर से शाह जी और वराह जी हुए जो मारवाड़ देश में खींची राजा के यहां गए जहां योगियों का प्रकरण था।
 
 

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