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लल्‍लू जी मिश्र
लल्‍लू जी के वैभवशाली होने का भी एक रोचक प्रसंग है। इनके वंशज लक्ष्‍मीनारायण जी के अनुसार शाहपुरा के राव प्रतापसिंह जी ने इनकी जमीन में से 6 बीघा जमीन बलपूर्वक दबा ली जिससे देवकरण जी (लल्‍लू जी के पिताश्री)  का शाहपुरा के राव जी से झगड़ा हो गया। तत् समय राजपूतों का बोलबाला था। शाहपुरा बड़ा ठिकाना था। देवकरण जी को जब न्‍याय नहीं मिला तो उनकी आत्‍मा कराह उठी और वे खिन्‍न होकर हरिद्वार के लिए रवाना हो गये। इनके परिवार के शेष बन्‍धु-बान्‍धव एवं लड़के आदि साईवाड़ ही रहे। हरिद्वार जाते समय रास्‍ते में दिल्‍ली आई। देवकरणजी दिल्‍ली स्थित फतेहपुरी में लक्ष्‍मीनारायण की धर्मशाला में रुके, वहीं रात्रि विश्राम किया। प्रात: स्‍नानादि से निवृत्त होकर संध्‍यावंदन के बाद अपने गोपालसहस्‍त्रनाम का सस्‍वर पाठ किया। संयोगवश धर्मशाला के निर्माता महेशादास जी भी वहां मौजूद थे।  महेशदासजी ने जब सस्‍वर संस्‍कृत के श्‍लोक (गोपाल-सहस्‍त्रनाम) सुने तो देवकरण जी के पास आकर उनसे उनका परिचय पूछा एवं बाद में प्रार्थना की  कि वे वहीं रहें, किंतु देवकरणजी नहीं माने। महेशदास जी के अत्‍याधिक आग्रह पर, देवकरण जी ने कहा, हरिद्वार से आकर रहूंगा और देवकरणजी दिल्‍ली के तीसरे नंबर के रईस के आतिथ्‍य में दिल्‍ली रहने लगे और बाद में उन्‍होंने अपने पांचों लड़कों को भी दिल्‍ली बुला लिया। उनके नाम थे- लक्ष्‍मीनारायण उर्फ लल्‍लू जी, कल्‍लू जी, चुन्‍नी जी, बंशीधर जी व खेमकरण जी।
महेशदास के प्रभाव से लल्‍लू जी की नियुक्ति लॉर्ड निकलसन, जो कि तत् समय वसूली अधिकारी के पद पर था, के पास जमादार के पद पर हो गई। अपने चातुर्य, कुशल व्‍यवहार एवं प्रशासनिक दक्षता के कारण वे लॉर्ड निकलसन के विश्‍वस्‍त बन गये तथा ऋण वसूली नहीं देने पर जो सम्‍पत्ति निलाम होती थी वह ये खरीद लेते थे और इस प्रकार कुछ ही समय में इनके वंशज लक्ष्‍मीनारायण जी के अनुसार 6 करोड़ की सम्‍पत्ति लल्‍लू जी के पास हो गई तथा इनकी गणना दिल्‍ली के प्रथम ग्‍यारह रईसों में की जाने लगी। यही नहीं आवश्‍यकता पड़ने पर आपने ब्रिटिश राज को भी कर्ज देकर आर्थिक मदद की।
लक्ष्‍मीनारायण जी एवं इनके वंशजों एवं दिल्‍ली के अनेकानेक पारीकों का कहना है कि दिल्‍ली के टाउन हॉल में लल्‍लू जी का भव्‍य चित्र था। अब टाउन हॉल के ये चित्र वहां से हटाकर अन्‍यत्र स्‍थानांतरित कर दिये गए।
लल्‍लू जी मिश्र की याद दिल्‍ली की लल्‍लू मिश्र की गली जिसके लगभग नौ विथिका पट्ट विभिन्‍न स्‍थानों से  गली में प्रवेश करने के स्‍थानों पर लगे हुए हैं युगों युगों तक उनकी स्‍मृति को चिर स्‍थाई रखेंगे। लल्‍लू जी द्वारा उनके मकान नं. 3469 में निर्मित राधाकृष्‍ण, शिवाजी एवं हनुमान जी का मंदिर जनता जनार्दन को उनकी याद दिलाता रहेगा.
व्‍यवहार कुशलता में भी उनका कोई मुकाबला नहीं था। राव राजा शाहपुरा से यद्यपि आपकी अनबन थी और इसी कारण इनके पिताजी ने साइवाड़ छोड़ा था, किंतु राव राजा जी के दिल्‍ली प्रवास के समय वे उन्‍हें अपने यहां ही ठहराते और विनोद पूर्वक कहते, आपसे झगड़ा होना ही हमारे वैभव की कहानी है।
   
 

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