दिवाकर गोलवाल व्यास वंश भूषण महात्मा लोकमणि जी का प्रादुर्भाव स.1741 में मेड़ता नगर में हुवा था। उनका मकान मेंड़ता की संस्कृत पाठशाला के पास ही हैं तथा लोक मणिश्वर महादेव उनके द्वारा ही स्थापित हुए हैं यह लोकोक्ति है कि महात्मा लोकमणि जी महाराज ने योग बल से सूर्य के रथ को थामकर योगबल की श्रेष्ठता का अपूर्व परिचय दिया था। एक बार उन्होनें मेड़ता नगर के समस्त ब्राह्मणों को भोजन के लिये आमन्त्रित किया, उस समय ईर्ष्या वश कुछ ब्राह्मणों ने भोज में शामिल होने के लिये शर्त रखी कि उनका मारवाड़ के राज्य चिन्हों (राज्यछत्र और छड़ी) से भोजन के समय स्वागत किया जाय तभी वे उसमें सम्मिलित होगें। महर्षिजीने इस शर्त को सहर्ष स्वीकार करके अपने शिष्यों को तत्काल मारवाड़ की राजधानी जोधपुर रवाना कर दिया और राज्य चिन्हों को ले आने के बाद समस्त आगन्तुको का स्वागत कर ब्रह्माभोज का आयोजन पूरा किया। कहते हैं ब्रह्मभोज में शामिल कुछ ब्रह्मण सूर्यास्त से पूर्व आहार ग्रहण करना चाहते थे एक और भोज में सम्मिलित सभी ब्राह्मण जहां पकवानों का रसास्वादन ले रहे थे वहीं दूसरी ओर महर्षिजी एक पैर पर खड़े होकर भगवान भुवन भास्कर की अराधना में मग्न थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यनारायण स्थिर हो गये जबकि अन्य जगह पर एक पहर रात्री व्यतीत हो चुकी थी। महर्षिजी ने आयू पर्यन्त मेड़ता सिटी से तीन कि.मी. दूर डागांवास ग्राम के रास्ते में पड़ने वाले डांगोलाई तालाब पर तपस्या की। अपनी कथनी और करनी के धनी ऐसे पुण्यात्मा की समाधि वर्तमान के मेड़ता सिटी के श्री पारीक संस्कृत महाविद्यालय में विद्यमान है। महर्षिलोक मणिजी के जन्म स्थान पर वर्तमान में मात्र एक यज्ञ स्थल बना हुआ है। पारीक समाज के ऐसे महात्मा को बारम्बार नमन।
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