विद्याध्ययन के पश्चात आप पिताश्री के आश्रम में आकर रहने लगे। सांसारिक बंधन एवं जीवों के जन्म-मरण से आपका मन व्यथित रहने लगा। आप सांसारिक बातों से उदासीन रहने लगे। अपनी अप्रतिम प्रतिभा के कारण प्रारंभ से ही आप देवताओं एवं ऋषियों एवं मानव मात्र के श्रद्धापत्र हो गये। अपका गृहस्थाश्रम के प्रति विमोह देखकर व्यासजी चिंतित होने लगे, तथा विवाह बंधन में आबद्ध करने हेतु व्यास जी इन्हें समझाने एवं प्रेरित करने लगे। इस प्रसंग में पिता पुत्र के मध्य विचार विमर्श भी होता। व्यास जी जहां गृहस्थाश्रम से श्रेष्ठ कोई दूसरा धर्म नहीं मानते वहीं शुकदेव जी गृहस्थाश्रम के कष्ट गिनाते। व्यास जी शुकदेव को समझाते ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी तथा गृहस्थी सभी गृहस्थाश्रम से ही पैदा होते हैं। वेद और स्मृतियों के विधानानुसार भी गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है तथा तीनों अन्य आश्रम वालों का पोषणकर्ता भी गृहस्थाश्रम है, यहां तक कि देवता भी अपना पोषण गृहस्थाश्रम से ही पाते हैं। व्यास जी उन्हें समझाते कि मनुष्य के चार ऋण होते हैं। पितृऋण, देवऋण, ऋषिऋण और मनुष्य ऋण। इन ऋणों की मुक्ति गृहस्थाश्रम से ही संभव है। जहां वह माता-पिता की सेवा व भरण-पोषण कर पितृ ऋण से, यज्ञादि सम्पन्न कराकर देव ऋण से, वेदों का अध्ययन और तपस्या कर ऋषि ऋण से तथा दान, दया, सहायता आदि द्वारा मनुष्य ऋण से उऋण हो सकता है। |