ग्राम दूदू के निवासी कवि और भक्त तिवारी मनभावनजी पारीक इतने काव्य-मर्म-वेत्ता थे कि जब किसी काव्य-ग्रंथ के किसी कठिन स्थलों का अर्थ किसी से स्पष्ट न हो सका तब महाराज से किसी व्यक्ति ने अनुरोध किया कि वे इनसे पूछे जायें। तुरंत दूदू के ठाकुरों को आज्ञा हुई कि वे उक्त कविजी को आदरपूर्वक बुला लावें। राज्य की ओर से रथ-सवार और हरकारे, ठाकुरों के भले आदमी सहित, दूदू पहुंचे और इन्हें लिवा लाए। कविजी ने प्रथम तो महाराज को एक ऐसा छंद बनाकर सुनाया जिसे सुनते ही उनकों वास्तविकता का भान हो गया। फिर ग्रंथ और उसके कठिन स्थल कवि जी को बताए गए। मनभावन जी ने कठिन स्थलों पर तुरंत विचार कर ऐसी सुंदरता से उनका स्पष्टीकरण किया कि महाराज मुग्ध हो गए। तब महाराज ने मनभावन जी से कहा कि आप यहीं रहें, पर कवि जी ने निवेदन किया कि आपकी आज्ञा का ही पालन किया जाता, बशर्ते कि ललीजी(सीताजी) के दर्शनों से वंचित रहना पड़े। कहते हैं कि श्री सीताजी उनको प्रत्यक्ष थी। मनभावनजी को महाराज ने बहुत कुछ दान-दक्षिणा देकर सम्मान पूर्वक विदा किया। इनके बहुत से शिष्य थे। स्वयं दूदू के ठाकुर पहाड़सिंह जी, ठकुराईने और उनके पुरुष कवि और भक्त इनके शिष्य थे। इनकी कविता बहुत सरस और सुंदर होती थी। इनका कोई स्वतंत्र ग्रंथ तो उपलब्ध नहीं हुआ, पर फुटकर पद मिलते हैं। नमूना यहां देते हैं-