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सेढाजी के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है जो निम्‍न प्रकार है:-
रनवास में मोरछली के पेड़ पर एक रोज एक गिलहरी बार-बार चढ़ती और उतरती थी। उस गिलहरी के इस प्रकार के कृत्‍य के संबंध में तत्‍कालीन नरेश ने स्‍थानीय विद्वानों से इसका कारण पूछा कि यह गिलहरी इस पेड़ पर बार-बार क्‍यों चढ़ती उतरती है। किंतु, उपस्थित विद्वानों में कोई भी गिलहरी के इस कृत्‍य के संबंध में संतोषजनक उत्तर नहीं दे सका। इस संबंध में पं. सेढ़ाजी से भी पूछा गया। श्री सेढाजी चतुर थे अत: उन्‍होंने सोच‍ विचार कर उत्तर दिया कि दिल्‍ली के बादशाह के यहां से महाराजा के लिए एक सुंदर संदूक खिलअत के सामान से भरा हुआ आवेगा और जब संदूक खोला जावेगा तो उसमें अन्‍य सामान के साथ एक गिलहरा भी होगा अत: गिलहरे के आने की खुशी में यह गिलहरी बार-बार मोरछली के पेड़ पर चढ़ उतर रही है तथा गिलहरे की तीव्रता से प्रतीक्षा कर रही है। उस समय तो सेढ़ाजी की बात को मजाक समझकर टाल दिया गया तथा कोई महत्‍व नहीं दिया गया किंतु कुछ ही समय बाद यह घटना हो गई, अत: बात के सत्‍य होने पर तथा भविष्‍यवाणी के ठीक निकलने पर राजमहल के अतिरिक्‍त सेढाजी का मान शहर में भी हो गया और लोग उनकी विद्वता की सराहना करने लगे।
श्री सेढाजी के दो पुत्र हुए, एक का नाम श्री हरजी तथा दूसरे का नाम पदमाकरजी था। पदमाकरजी आमेर रहे। चूंकि सेढाजी रानी जी के साथ डायजे के रूप में आये अत: आपके वंशज डायजवाल पुरोहित कहलाये। सेढाजी के प्रथम पुत्र हरजी खींचीवाडा़ चले गए तथा वहीं पर रहे अत: वे डायजवाल पुरोहित कहे जाने लगे। हरजी पुरोहित को राजा ने प्रसन्‍न होकर एक पातर भेंट की थी। पदमाकर जी ने अपने भाई हरजी से अनुरोध किया कि वो पातर न रखे। इस पर हरजी तीर्थ करने चले गये जिनमें अन्‍य तीर्थों के अतिरिक्‍त हरिद्वार जी भी सम्मिलित है। हरिद्वार तथा अन्‍य तीर्थ स्‍थानों पर उन्‍होंने अपने नाम से 'हर की पौड़ी' (अर्थात घाट) बनवाये। हरिद्वार की हर की पौड़ी आज भी हर जी का हमें स्‍मरण कराती है।
इन्‍हीं सेढाजी महाराज को सेढाजी वेद पुंज भी कहते हैं।
 
 

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