श्री सेढाजी के दो पुत्र हुए, एक का नाम श्री हरजी तथा दूसरे का नाम पदमाकरजी था। पदमाकरजी आमेर रहे। चूंकि सेढाजी रानी जी के साथ डायजे के रूप में आये अत: आपके वंशज डायजवाल पुरोहित कहलाये। सेढाजी के प्रथम पुत्र हरजी खींचीवाडा़ चले गए तथा वहीं पर रहे अत: वे डायजवाल पुरोहित कहे जाने लगे। हरजी पुरोहित को राजा ने प्रसन्न होकर एक पातर भेंट की थी। पदमाकर जी ने अपने भाई हरजी से अनुरोध किया कि वो पातर न रखे। इस पर हरजी तीर्थ करने चले गये जिनमें अन्य तीर्थों के अतिरिक्त हरिद्वार जी भी सम्मिलित है। हरिद्वार तथा अन्य तीर्थ स्थानों पर उन्होंने अपने नाम से 'हर की पौड़ी' (अर्थात घाट) बनवाये। हरिद्वार की हर की पौड़ी आज भी हर जी का हमें स्मरण कराती है।