आप पूर्वाश्रम में पारीक पुरोहित थे इनके संत बनने का भी एक रोचक किस्सा है। प्रहलाद जी बीकानेर के पुरोहित थे। बीकानेर नरेश जैतसिंह के पुत्र भीमराज जी (जो बाद में बड़े सुंदरदास जी हुए) प्रारंभ से ही हरि भक्त थे, भीमराज जी की माताजी का नाम कश्मीर दे था। आपका जन्म संवत् 1589 में हुआ था। घरवालों के दबाव से आपने शादी की 0संवत् 15980। कालांतर में भीमराज की वीरता से प्रभावित होकर अकबर बादशाह ने इन्हें चिन्दारमीपुर के राजा चंद्रसेन के सैन्य दल के साथ काबुल भेजा जहां भीमराज ने बड़ी वीरता से युद्ध किया तथा मिर्जा हाकिम को हराया किंतु वे युद्ध में घायल होकर मूर्च्छित हो गये। जब मिर्जा अपने दल सहित संधि करने आ रहा था तब भीमराज के सैनिकों ने यह समझा कि मिर्जा हाकिम पुन: आक्रमण करने के लिए आ रहा है। अत: वे भीमराज जी को मृत समझकर भाग गये। इधर चिन्दारमीपुर के सैनिकों को यह ज्ञात हुआ कि भीमराज जी युद्ध स्थल में पड़े हैं तब भीमराज जी को उठाकर महाराज चन्द्रसेन के डेरे में ले गये जहां कुछ समय बाद वे स्वस्थ हो गये। उधर भीमराज जी के सैनिकों ने उन्हें मरा हुआ मानकर बीकानेर उनको वीरगति प्राप्त होने का समाचार दे दिया। स्वस्थ होकर भीमराज जी जब अपने निवास बीकानेर को जा रहे थे तो रास्ते में मथुरा आया जहां उनके पुरोहित प्रहलाद जी उन्हें मिले। प्रहलाद दास जी उन्हें देखकर आश्चर्य चकित हो गये क्योंकि वे तो उनका गया-श्राद्ध कराकर आ रहे थे। वार्तालाप से भीमराज जी को यह ज्ञात होने पर कि, वे मेरा (भीमराज जी का) गया श्राद्ध कराके आ रहे है तथा उनकी धर्मपत्नी सती हो गई है भीमराज जी को वैराग्य हो गया और उनके कुलगुरू प्रहलाद जी घर जाकर पुन: उनके साथ हो गये। प्रहलाद जी भीमराज जी के साथ ही दादू जी के शिष्य हो गये। एक बार प्रहलाद जी ने दादू जी से यह पूछा कि मुझे आज्ञा दीजिये मेरा कर्तव्य क्या है? सुन्दरदास जी के साथ रहूँ या अलग? दादू जी ने आपको निर्देश दिया कि सुन्दरदास जी को ही अपना गुरू मानकर निष्काम भाव से भजन करो आपने सुन्दरदास जी को गुरू बनाया तथा प्रहलाद दास जी हो गये। आप सुन्दरदास जी के साथ द्वन्दूपुरी, घाटड़े गये आपने अंतत: सुन्दरदास जी की आज्ञा से अपनी तप:स्थली द्याटडा बनाई व वहीं रहे। |