ब्राह्मण कुल में जन्म के कारण जन्मना एवं संस्कारगत कर्मणा मां सरस्वती की अर्चना करना तो हमारा पुनीत कर्म था ही, क्षात्र धर्म की परम्परा का निर्वाह करना भी हमनें अपना कर्तव्य माना था। समराङगण में क्षत्रियों के विमुख हो जाने अथवा असफल हो जाने पर ब्राह्मण हाथ में तलवार ले दस्युओं को ललकारता था। आर्य ऋषियों की इस परम्परा का निर्वार पारीक जाति करती रही है। यही अवस्था अन्य क्षेत्रों में भी रही है। व्यापार एवं कृषि कर्म में इन्हीं ने अपनी दक्षता का पिरचय दिया है। यदि यह जाति पराशर को अपना पूर्वज मानती है तो उसे पराशर ऋषि के आदर्शों को अपनाना चाहिए।