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प्रस्‍तुत लेख में इसी उद्देश्‍य को लेकर श्रीगणेश के रूप में हमारी जाति के मेवाड़ के खेराड़ प्रदेश में स्थित जालिया (जाल्‍या) ग्राम के पुरोहित परिवार से संबंधित एक ताम्र पत्र प्रकाशित कराया जा रहा है। ताम्रपत्र का एक ऐतिहासिक महत्‍व है। पारीक जाति का इतिहास लिखते समय इस प्रकार की सामग्री उपयोगी होगी।
इतिहास प्रसिद्ध महाराणा सांगा की मृत्‍यू के उपरान्‍त समस्‍त राजस्‍थान की राजनीतिक स्थिति डांवाडोल हो रही थी। ऐसी अवस्‍था में उनके पुत्र रत्‍नसिंह और महाराणा विक्रमादित्‍य क्रमश: सिंहासनारूढ़ हुए। महाराणा विक्रमादित्‍य के सिं‍हासनारूढ़ होने की तिथि‍ कर्नल टाड के अनुसार संवत् 1591 वि. है परन्‍तु यह असंगत प्रतीत होती है। जाल्‍या ग्राम के पुरोहित परिवार से सम्‍बन्धित इस ताम्रपत्र से विक्रमादित्‍य के सिंहासनारूढ़ होने की तिथि निश्चित करने में सहायता मिलती है।
प्रस्‍तुत दानपात्र उक्‍त महाराणा विक्रमादित्‍य द्वारा उनके मांडलगढ़ में पाणिग्रहण संस्‍कार के समय पुरोहित जानाशंकर को रावत भवानीदास एवं हाडा अर्जुनदास की साक्षी में दिये गये जाल्‍या ग्राम से सम्‍बन्धित है। पुरोहित जानाशंकर के वंशधर आज भी उक्‍त जाल्‍या ग्राम में रहते हैं। उक्‍त ताम्रपत्र की तिथि वैशाख शुक्‍ला 11 संवत् 1589 दी गई है। उसमें विक्रमादित्‍य को महाराणा की उपाधि से विभूषित किया गया लिखा है। इससे स्‍पष्‍ट है कि सं. 1589 में वैशाख शुक्‍ला 11 से पूर्व ही यह महाराणा बन गये थे। कविराजा श्‍यामलदास ने इसका सर्वप्रथम उल्‍लेख अपने ग्रन्‍थ, 'वीर विनोद' में किया था। डॉ. गोरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी 'राजपूताने का इतिहास' पुस्‍तक में इस ताम्रपत्र की ओर संकेत करते हुए उक्‍त महाराणा के राज्‍याभिषेक की तिथि सं. 1588 निश्चित की।
इस लेख से स्‍पष्‍ट है कि मांडलगढ़ (बूंदी) के हाडा नृपति की राजकुमारी मेवाड़ राजवंश के महाराणा विक्रमादित्‍य के पाणिग्रहण संस्‍कार में पौरोहित्‍य कर्म संपन्‍न कराने वाला जानाशंकर हाडाओं (चौहानों) का राजपुरोहित था। जन श्रुतियों के आधार पर व‍ह विद्वान भी था। उसके पूर्वजों की परम्‍परा भी उसी के अनुरूप रही होगी। बूंदी के हाडाओं का पौरोहित्‍य पारीक पुरोहितों को प्राप्‍त था। इसी प्रकार खींची चौहानों का पौरोहित्‍य भी कांथडि़या पुरोहित करते थे। बूंदी और मांडलगढ़ के हाड़ा चौहान अजमेर के चौहानों की परम्‍परा में, जिसमें वीसलदेव, सोमेश्‍वर, पृथ्‍वीराज जैसे सम्राटों ने जन्‍म लिया था। अत: संभव है, चौहानों के पौरोहित्‍य कर्म का यह अधिकार परम्‍परा से ही पारीकों के इस कुल को प्राप्‍त राह हो।
यदि इन प्राचीन राजवंशों के पुरोहितों के परिवारों से इसी प्रकार की सामग्री प्रकाश में लायी जाये तो इतिहास की अनेक उलझी कडि़यां सुलझ सकती हैं। साथ ही पारीक जाति के इतिहास का भी प्रणयन करने में इनसे सहायता मिलेगी। उपर्युक्‍त ताम्र पत्र इस समय विक्‍टोरिया हॉल संग्रहालय, उदयपुर में संगृहित है। ताम्र पत्र का आकार 9 11/16" x 6 9/16" है। इसमें कुल 14 (शीर्षक सहित 16) पंक्तियां हैं। मूल ताम्रपत्र टूट जाने से उसे 10" x 7 10/16" आकार के एक अन्‍य ताम्र पत्र पर चिपका कर सुरक्षित किया गया है।
   
 

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