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   Pareek Gaurav
 
 

 
 
Home > Pareek Gaurav > Up to 19th Century > Parbat Ji Purohit
 
 
परम वैष्णव पुरोहत पर्वत जी
आमेर के महाराजा भारमल ने परम वैष्‍णव पुरोहित पर्वत जी की ईश्‍वर भक्ति, विद्वता एवं श्रद्धास्‍पद व्‍यक्तित्‍व के प्रति श्रद्धानत होकर उन्‍हें राजगुरु का सम्‍मान दिया और 6000 बीघा उपजाऊ जमीन वर्तमान जयपुर नगर से 15 किलोमीटर पश्चिम में कर विहीन जागीर भेंट की जहां उपयुक्‍त स्‍थान पर पुरोहित पर्वतजी ने गांव बसाया। रमणीक वातावरण, अनेक तालाबों, नाडि़यों, जलाशयों से सुशोभित सर्व भांति के अन्‍न, द्विदल, तिलहन, कपास आदि की कृषि सम्‍पन्‍न और असंख्‍य आम्र वृक्षों से आच्‍छादित उक्‍त ग्राम का नाम "सरसी" रखा जो कालान्‍तर में अपभ्रंश होकर वर्तमान में सिंरसी ग्राम कहलाता है। ग्राम "सिरसी" निम्‍न श्‍लोक के अनूरूप अपने मूल नाम सरसी की सार्थकता सिद्ध करता है:-
"सरसी च तत्‍परिसरे sच्‍छजला
फलभार नम्र आम्रतक रम्‍यतटा"
अर्थात स्‍वच्‍छ जल वाली, फलों के भार से झुके हुए आम्र वृक्षों से रमणीय तट वाली यह सरसी सुशोभित हो रही है।
सोलहवीं शताब्दी के आसपास आमेर के महाराजा पृथ्‍वीराज ने वैष्‍णव सम्‍प्रदाय को छोड़ नाथ सम्‍प्रदाय में अभिशिक्‍त होकर नाथ को गुरु बना लिया और उसकी प्रतिशोधयुक्‍त प्रभावना से अन्‍य धर्मावलम्बियों का आमेर में अपमान होने लगता तो समस्‍त वैष्‍णव धर्माचार्य वहां से पलायन कर गए और आमेर से प्राय: सभी वैष्णव गद्दियां उठ गई। उस अवांछनीय स्थिति एवं भावी अकल्‍याण के निवारणार्थ स्‍वामी रामानन्‍दाचार्य के प्रथम शिष्‍य कृष्‍णदास पयहारी जी महाराज आमेर पधारे और पुरोहित पर्वत जी के माध्‍यम से उनकी शिष्‍या वैष्‍णव भक्तिमती महारानी बालाबाई के अतिथि बनकर राजमहल के ही एक भाग में पुरोहित पर्वत जी के आवास कक्ष के निकट अपनी धूणी रमा तपस्‍या करने लगे। शनै: शनै: महर्षि पयहारी जी ने अपनी विद्वता एवं तपोबल से नाथ गुरु के प्रतिशोधपूर्ण चमत्‍कारों को निष्‍प्रभावी कर उसे जयपुर राज्‍य की सीमा छोड़कर पलायन करने पर विवश कर दिया और महाराज पृथ्‍वीराज को पुन: वैष्‍णव धर्म में दीक्षित कर आमेर छोड़कर गए धर्माचार्यों को ससम्‍मान वापस बुलाकर समस्‍त वैष्‍णव गद्दियों को पूर्ववत आमेर में पुन: प्रतिष्‍ठापित किया।
 
 

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