आमेर के महाराजा भारमल ने परम वैष्णव पुरोहित पर्वत जी की ईश्वर भक्ति, विद्वता एवं श्रद्धास्पद व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धानत होकर उन्हें राजगुरु का सम्मान दिया और 6000 बीघा उपजाऊ जमीन वर्तमान जयपुर नगर से 15 किलोमीटर पश्चिम में कर विहीन जागीर भेंट की जहां उपयुक्त स्थान पर पुरोहित पर्वतजी ने गांव बसाया। रमणीक वातावरण, अनेक तालाबों, नाडि़यों, जलाशयों से सुशोभित सर्व भांति के अन्न, द्विदल, तिलहन, कपास आदि की कृषि सम्पन्न और असंख्य आम्र वृक्षों से आच्छादित उक्त ग्राम का नाम "सरसी" रखा जो कालान्तर में अपभ्रंश होकर वर्तमान में सिंरसी ग्राम कहलाता है। ग्राम "सिरसी" निम्न श्लोक के अनूरूप अपने मूल नाम सरसी की सार्थकता सिद्ध करता है:- |