गुरु पयहारी जी महाराज के आदेश के सम्मुख नतमस्तक होकर तपोमूर्त बाल ब्रह्मचारी पुरोहित पर्वत जी ने श्री नृसिंह मूर्ति की सेवा पूजार्थ प्रौढ़ावस्था में विवाह किया जिनसे तीन पुत्र- गोपाल जी, परसराम जी, खेमू जी उत्पन्न हुए जिनके नाम संवत 1600 में सांगानेर में निर्धारित पारीक जातीय सरखत(सामाजिक प्रबन्ध पत्र) में हस्ताक्षर करने वालों में अंकित है। उनके एक पुत्री हुई, जो अपने स्वर्गीय पति के साथ सती होने के कारण उनके भातृ वंशजों में अब तक सम्मान्य है। बक्षा जी, राघव जी, किशोर जी एवं उनके वंशजों ने अपने पूर्वजों की भक्ति परम्परा को सुचारू रखते हुए नृसिंह जी की सेवा पूजा करते रहने के अतिरिक्त समय-समय पर सांगानेर, सांभर(देवयानी), पुष्कर, आमरे(कुण्डाग्राम), जयपुर आदि अनेक स्थानों पर मन्दिर, कुण्ड, कूप, जलाशय, विश्रामगृह आदि जन हितार्थ बनवाये और अपने ग्राम सिरसी में कुण्ड, धर्मशाला, पीने व सिंचाई के अनेक कुंए, अनेक छोटे व पांच बड़े मंदिरों का निर्माण किया जिनमें से 17वीं शताब्दी में निर्मित श्री लक्ष्मीनारायण जी का मंदिर तो अत्यंत कलात्मक भव्य एवं दर्शनीय है।