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उक्‍त इतिहास प्रसिद्ध कार्यवाही में महाराजा पृथ्‍वीराज एवं नाथ गुरु के कोप से निर्भीक रहकर भगवद् भक्‍त पुरोहित पर्वत जी ने आदि से अंत तक पयहारी जी महाराज की तन मन से सेवा एवं सहायता की जिससे वे अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न हुए। अपने लक्ष्‍य में पूर्णरूपेण सफलता प्राप्‍त कर पयहारी जी जब अमेर से वापस जाने लगे तो, महाराजा पृथ्‍वीराज की प्रार्थना पर आमेर राज्‍य को मुगल बादशाहों के कुचक्री अतिक्रमणों से बचाने तथा समृद्धि एवं स्‍थायित्‍व प्रदान करने के लिए वरदान रूप में श्री नृसिंह देव की स्‍वर्ण मंडित निज सेवा की सालिग्राम मूर्ति चील के टीले पर (जहां अब जयगढ़ का किला बना हुआ है) महाराजा को सौंपते हुए आदेश दिया कि मूर्ति को राजमहल में उसी कक्ष में स्‍थापित किया जाय जहां पयहारी जी रहे थे। कभी किसी परिस्थिति में मूर्ति को देली (मंदिर कक्ष की देहरी) से बाहर न निकाली जावे और श्री नृसिंह मूर्ति की सेवा पूजा पर्वत जी एवं उनके वंशजों से ही कराई जावे। तभी से जयपुर में यह कहावत प्रसिद्ध हुई कि "जब तक नरसिंह देली में, तब राज हथेली में" इसे संयोग कहा जाये या भगवान लक्ष्‍मी नृसिंह द्वारा अपने भक्‍त पयहारी जी के वचनों को सत्‍य करना, कि देश की स्‍वतंत्रता के बाद गठित राजस्‍थान प्रदेश में जयपुर राज्‍य का विलीनीकरण तो होना ही था, एक पागल सा दर्शनार्थी सोने के लालच में नृसिंह जी की सालिग्राम मूर्ति को मन्दिर से चुरा ले गया। अल्‍प समय में ही चोर भी पकड़ा गया, मूर्ति भी वापस लाकर पुन: प्रतिष्‍ठा कर दी गई। परन्‍तु जयपुर राज्‍य को कछावा राजवंश की हथेली से बाहर जाने से पूर्व ही नृसिंह मूर्ति ही देली (देहरी) बाहर चली गई और कुछ समय बाद पर्वतवंशीय सिरसी के पारीकों ने भी री नृसिंह जी की सेवा पूजा सरकार को संभला दी।
गुरु पयहारी जी महाराज के आदेश के सम्‍मुख नतमस्‍तक होकर तपोमूर्त बाल ब्रह्मचारी पुरोहित पर्वत जी ने श्री नृसिंह मूर्ति की सेवा पूजार्थ प्रौढ़ावस्‍था में विवाह किया जिनसे तीन पुत्र- गोपाल जी, परसराम जी, खेमू जी उत्‍पन्‍न हुए जिनके नाम संवत 1600 में सांगानेर में निर्धारित पारीक जातीय सरखत(सामाजिक प्रबन्‍ध पत्र) में हस्‍ताक्षर करने वालों में अंकित है। उनके एक पुत्री हुई, जो अपने स्‍वर्गीय पति के साथ सती होने के कारण उनके भातृ वंशजों में अब तक सम्‍मान्‍य है। बक्षा जी, राघव जी, किशोर जी एवं उनके वंशजों ने अपने पूर्वजों की भक्ति परम्‍परा को सुचारू रखते हुए नृसिंह जी की सेवा पूजा करते रहने के अतिरिक्‍त समय-समय पर सांगानेर, सांभर(देवयानी), पुष्‍कर, आमरे(कुण्‍डाग्राम), जयपुर आदि अनेक स्‍थानों पर मन्दिर, कुण्‍ड, कूप, जलाशय, विश्रामगृह आदि जन हितार्थ बनवाये और अपने ग्राम सिरसी में कुण्‍ड, धर्मशाला, पीने व सिंचाई के अनेक कुंए, अनेक छोटे व पांच बड़े मंदिरों का निर्माण किया जिनमें से 17वीं शताब्‍दी में निर्मित श्री लक्ष्‍मीनारायण जी का मंदिर तो अत्‍यंत कलात्‍मक भव्‍य एवं दर्शनीय है।
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