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राघवदास जी
राघवदास जी द्वारा निर्मित लक्ष्‍मीनारायण मंदिर के कारण वे आज भी अमर हैं। उक्त मंदिर स्‍थापत्‍य कला के कारण अपनी विशिष्‍टता लिए हुए हैं। नगर परिक्रमा के स्‍तम्‍भकार श्री नन्‍दकिशोर जी पारीक के अनुसार कर-मुक्त जागीर के रूप में सिरसी प्राप्‍त करने वाले पुरोहित पर्वतजी के तीन पुत्रों में परसराम दूसरा पुत्र था। इस परसराम का पुत्र राघवदास था जिसने संवत् 1698 (1641 ई.) में इस कलात्‍मक मंदिर का निर्माण कराया, जिसका गर्भ-गृह अपने उत्तुं शिखर, आमलक और कलश-सहित आज तक सुरक्षित है। मण्‍डप, अंतराल और गरुड़ की छत्री भी यथावत है। यह इसलिए कि राघवदास के वंशजों और सिरसी के पारीकों ने इस विरासत को सुरक्षित रखने की ओर विशेष ध्‍यान दिया है। मंदिर-निर्माता और उनके उत्तराधिकारियों ने मंदिर की सेवा पूजा और भोग-राग के लिए खेती की जमीनें भगवन लक्ष्‍मीनारायण को भेंट की थी। वह जमीनें तो काल- प्रवाह के साथ जाती रहीं, किंतु आज भी 43 बीघा कृषि भूमि इस मंदिर के लिए पृथक से निर्धारित है और ग्‍यारह सदस्‍यों का एक न्‍यास, जो 1957 ई. में पंजिकृत हुआ था, इसके रख-रखाव, विभिन्‍न पर्व उत्‍सवों के आयोजनों और विकास के लिए उत्तरदायी है।
आमरे के पुराने महल में बालांभाई की नाल के निकट पयहारीजी द्वारा पृथ्‍वीराज को प्रदत्त शालग्राम रूप नृसिंह की सेवा पूजा के लिए नियुक्‍त पुरोहित पर्वत जी के पौत्रों तथा उनके वंशजों ने सिरसी को अनेक मंदिरों से अलंकृत किया और सांगानेर, आमेर, देवयानी, पुष्‍कर आदि में भी देवालय बनवाए जो अद्यावधि वर्तमान हैं। सिरसी उनका पैतृक गांव था, जहां उन्‍होंने अपने-अपने आवासीय भवन तो बनाए ही, आम्र कुंज या बगीचे भी विकसित किए और अपनी-अपनी भावना के अनुसार देवालयों का निर्माण भी करवाया 'पारीक जाति का इतिहास' में रघुनाथ प्रसाद तिवाड़ी 'उमंग' ने एक विस्‍तृत सूची दी है जिसमें पारीकों द्वारा निर्मित मंदिरों, शिक्षण संस्‍थाओं, आश्रम-धर्मशालाओं, कुण्‍ड-बावडि़यों तथा अन्‍य जनोपयोगी निर्माण- कार्यों का उल्‍लेख किया है। इस सूची में सिरसी के नौ मंदिर गिनाए गए हैं जिनमें पांच तो बड़े और महत्‍वपूर्ण हैं। यह हैं- श्री लक्ष्‍मीनारायण, कल्‍याणजी, रघुनाथजी, नृसिंह जी और हनुमान जी के मंदिर। लक्ष्‍मीनारायण या लक्ष्‍मीनाथजी का मंदिर गांव के मध्‍य में सबसे विशाल और दर्शनीय है तथा इसका उत्तुंग पाषाण-निर्मित शिखर ही सिरसी की आकाश-रेखा बनाता है।
लक्ष्‍मीनारायण का मंदिर लगभग पंद्रह फुट ऊंची कुर्सी पर बना है जिसके अंतराल या प्रवेश, मण्‍डप (जगमोहन) और गर्भ-गृह के ऊपर सुघड़ पत्‍थरों से बने भव्‍य शिखर हैं और सामने एक छत्री में गरुड़ की संगमरमर की मूर्ति विराजमान है। परम्‍परागत शैली में निर्मित यह मंदिर झोटवाड़ा के लक्ष्‍मीनाथ मंदिर और नांगल जयसा बोहरा के गोपाल जी के मंदिर से साम्‍य रखता है, किन्‍तु निश्‍चय ही उनसे पहले बना हुआ है। इस क्षेत्र में अजमेर रोड पर भांकरोटा से आगे भवानीपुरा में नकटी माता का मंदिर प्रतिहारकालीन देवालय- निर्माण की अलंकृत शैली का एक प्रतिनिधि नमूना है। आमेर में कल्‍याणराय जी का मंदिर तथा जमाडोली (पुराना घाट) में हनुमान जी के मंदिर के ऊपर एक प्राचीन मंदिर का अवशिष्‍ट शिखर तथा पंच गणेश शिला भी प्रतिहार काल की हैं। सिरसी के लक्ष्‍मीनारायण मंदिर की योजना तथा उसके गर्भ गृह के अलंकृत प्रवेश द्वार में भी प्रतिहार-काल की प्रति-छाया स्‍पष्‍ट है। यह प्रवेश-द्वार विष्‍णु के दशावतारों तथा दोनों ओर शिव पार्वती तथा गणेश की प्रतिमाओं से समलंकृत है और अपनी कलात्‍मकता से आज भी दर्शक को प्रभावित करता है। इस देव मंदिर की देहरी भी प्राचीन प्रतिहार कालीन मंदिरों जैसी ही है आमरे के जगत शिरोमणि जी और कल्‍याणजी के मंदिरों की कलापूर्ण देहरियों से होड़ लगाती है।
   
 

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