आमरे के पुराने महल में बालांभाई की नाल के निकट पयहारीजी द्वारा पृथ्वीराज को प्रदत्त शालग्राम रूप नृसिंह की सेवा पूजा के लिए नियुक्त पुरोहित पर्वत जी के पौत्रों तथा उनके वंशजों ने सिरसी को अनेक मंदिरों से अलंकृत किया और सांगानेर, आमेर, देवयानी, पुष्कर आदि में भी देवालय बनवाए जो अद्यावधि वर्तमान हैं। सिरसी उनका पैतृक गांव था, जहां उन्होंने अपने-अपने आवासीय भवन तो बनाए ही, आम्र कुंज या बगीचे भी विकसित किए और अपनी-अपनी भावना के अनुसार देवालयों का निर्माण भी करवाया 'पारीक जाति का इतिहास' में रघुनाथ प्रसाद तिवाड़ी 'उमंग' ने एक विस्तृत सूची दी है जिसमें पारीकों द्वारा निर्मित मंदिरों, शिक्षण संस्थाओं, आश्रम-धर्मशालाओं, कुण्ड-बावडि़यों तथा अन्य जनोपयोगी निर्माण- कार्यों का उल्लेख किया है। इस सूची में सिरसी के नौ मंदिर गिनाए गए हैं जिनमें पांच तो बड़े और महत्वपूर्ण हैं। यह हैं- श्री लक्ष्मीनारायण, कल्याणजी, रघुनाथजी, नृसिंह जी और हनुमान जी के मंदिर। लक्ष्मीनारायण या लक्ष्मीनाथजी का मंदिर गांव के मध्य में सबसे विशाल और दर्शनीय है तथा इसका उत्तुंग पाषाण-निर्मित शिखर ही सिरसी की आकाश-रेखा बनाता है। |