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भक्‍त की प्रेम-सेवा की भूख जितनी बढ़ती है, उतनी ही भगवान् की भी उसकी प्रेम सेवा का सुख भोगने की भूख बढ़ती है। ''ऐसे भूखे साधक की आर्तिपूर्ण हृदय से की गयी सेवा से आर्तबन्‍धु श्री भगवान का हृदय, जिस प्रकार सुख से विगलित होता है। उस प्रकार स्‍वधर्म का विधिपूर्वक पालन करने वाले या केवल कर्तव्‍य बुद्धि से निष्‍काम कर्म करने वाले साधक की साधना से होता है। पद्यावली के एक श्‍लोक में प्रेमी साधक की इस भूख का वर्णन इस प्रकार है-
नानोपचारकृत - पूजन-मार्तबन्‍धो
प्रेम्‍णैव भक्‍तहृदयं सुख - विद्रुतं स्‍यात्।
यावत् क्षु‍दस्ति   जठरे   जरठा    पिपासा
तावत् सुखाय भवति ननु भक्ष्‍यते यत् ।। (पद्यावली 10)
''श्‍लोक का भाव यह है कि उदर में जितनी भूख और प्‍यास होती है, उतना ही अन्‍न-जल तृप्तिकर होता है। उसी प्रकार भगवान् की प्रेम-भाव की भक्‍त में जितनी भूख होती है, उतनी ही वह तृप्तिकर होती है- केवल भक्‍त के लिए नहीं, भगवान् के लिए भी। भगवान आर्तबन्‍धु हैं। वे भक्‍त में प्रेम-सेवा की जितनी भूख देखते हैं, उतनी ही उनकी जठराग्नि जाग उठती है। वे भी उसकी प्रेम- सेवा ग्रहण करने को उतने ही अधिक व्‍यग्र हो उठते हैं और ग्रहण कर उनकी भी तृप्ति उतनी ही अधि‍क होती है।
''भगवान की जठराग्नि जगाने का एकमात्र उपाय है हृदय में उन्‍हें प्रसन्‍न करने की तीव्र लालसा लेकर श्रवण-कीर्तनादि शुद्धा-भक्ति के कार्यों में संलग्र रहना।'' संतदास जी के संबंध में प्राय: सभी भक्‍तमालों में इनक जीवन-दर्शन का उल्‍लेख है। नाभादास जी की भक्तमाल में जो छप्‍पय दिया गया है उसमें इन्‍हें भगवद् धर्म की सीमा (मर्यादा) बताया गया है तथा प्रभु को नित्‍य छप्‍पन भो‍ग अर्पित करने का वर्णन है नाभादास जी की भक्तमाल में जो वर्णन किया गया है वह निम्‍न प्रकार है-

(621) छप्‍पय।(222)

बिमलानंद प्रबोध वंश, ''संतदास'' सींवा धरम।।
गोपीनाथ पद राग, भोग छप्‍पन भुंजाये।
पृथु पद्धति अनुसार देव दंपति दुलराये।।
भगवत भक्त समान, ठौर द्वै कौ बल गायौ ।
कवित सूर सों मिलत भेद कछु जात न पायौ।।
जन्‍म, कर्म, लीला, जुगति, रहसि, भक्ति भेदी मरम।
              बिमलानंद, प्रबोध बंस, ''संतदास'' सींवा धरम।। ।।125।। (89)
   
 

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