तत्पश्चात श्याम पांडिया ने अपनी निगरानी में मुख्य वेदी का पुन: निर्माण कराया और देश विदेश से आए पंडितों के साथ सम्मिलित रहकर कलिकाल के उस महान अश्वमेध यज्ञ को सफलता पूर्वक सम्पन्न कराया। यज्ञ पूर्णाहुति के पश्चात् महाराजा सवाई जयसिंह ने याज्ञिकों व पंडितों को पर्याप्त एवं मनोवांछित दक्षिणाएं व उपहार देकर विदा यिका और पौंडरीक जी, सम्राट जी, ओझा जी जैसे अनेक सिद्धों, पंडितों याज्ञिकों को नवस्थापित जयपुर नगर की ब्रह्मपुरी बस्ती में बसने के लिए निवेदन करते हुए बड़ी-बड़ी जागीरें, विशाल आवासीय भवन, बाग, भूमि भेंट की और महापंडित श्याम पांडिया को भी उनका समस्त सुविधाओं सहित जयपुर में बसने हेतु निवेदन किया तो उन्होंने अपनी सर्वत्यागी प्रवृत्ति के अनुरूप कुछ भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया और वापस अपने गांव जाकर रहने लगे।