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व्‍यापार के सिलसिले में महाराजाधिराज सवाई जयसिंह जी ने पुरोहित घासीराम जी को अपना मुद्रांकित पट्टा प्रदान किया था।
जयपुर राज्‍य की भांति ही जोधपुर राज्‍य की ओर से भी इस घराने को व्‍यापार करने के लिए आधी जगात की माफी का पट्टा मिला हुआ है। लेन-देन का सम्‍बन्‍ध इस घराने का जयपुर राज्‍य से भी रहा है। समय-समय पर जब राज्‍य को रुपये की आवश्‍यकता उपस्थित हुई तभी इन्‍होंने रकमें देकर सहायता की। महाराजाधिराज सवाई प्रतापसिंह संवत् 1848 के समय में इस घराने के पुरोहित लक्षमणदास जी से रुपये लेकर सूबेदार तुकोजी राव होल्‍कर को दिये गये थे। बीकानेर के महाराजा सूरतसिंह जी ने भी इस घराने के साथ लेन-देन का व्‍वहारा रखा। बीकानेर राज्‍य के हिसाब बेवाकी संवत् 1943 में हुई है।
संवत् 1793 में राव शिवसिंहजी पुरोहित घासीराम को जयपुर से अपने साथ सीकर लिवा कर लाये और उसी यात्रा में उन्‍होंने हरमाड़ा के मुकाम फतहपुर की पट्टी के मौजे ताजसर का उदक सीगे पट्टा देकर अपने पुराने सुसम्‍बन्‍ध को दृढ़ किया। इससे पहले राव शिवसिंहजी के पिता और पितामह राव दौलतसिंह जी एवं जसवन्‍तसिंह जी पुरोहित घासीरामजी के पूर्वज मोहनरामजी के साथ व्‍यवहार कर चुके थे। राव दौलतसिंह जी ने संवत् 1752 में उदक रूप में भूमि प्रदान की थी जिसमें इस समय ढाणी आबाद है और पुरोहित जी की ढाणी के नाम से पुकारी जाती है।
राव शिवसिंह के समय से ही इस घराने को सीकर में स्‍थायी रूप से आबाद होने का सुयोग प्राप्‍त हुआ है। सीकर में प्रासादोपम हवेली और दुकाने पुरोहित घराने के स्‍वरूपानुरूप ही बनी हुई हैं। सीकर की ओर से प्रारम्‍भ में ही कासाखर्च भोजन व्‍यय नियत होकर उनके लिये निज की व्‍यवहारोपयोगी वस्‍तुओं पर पूरी तथा व्‍यवहार के लिए आधी जगात(कस्‍टम ड्यूटी) मुआफ की गई थी। इसके अतिरिक्‍त भी सब तरह की सुविधाएं उन्‍हें दी गई थी। राव शिवसिंह जी के परवर्ती राव समर्थसिंहजी, नाहरसिंहजी, चादसिंहजी, बुधसिंहजी, देवीसिंहजी और रावराजा लक्ष्‍मणसिंह जी प्रभूति ने भी यथा समय आराजी और कोठियां चाही उदक सीगे उत्‍सर्ग करी जिन का उपभोग यह घराना करता आ रहा है।
कठिन परिस्थितियों में इस घराने के साहस संपन्‍न पुरुषों ने सीकर को रुपये देकर पूरी सहायता पहुंचाई है। जयपुर राज्‍य के साथ मामला निश्चित होन पर न केवल सीकर की जमानत उन्‍होंने ली प्रत्‍युत बहुत समय तक मामले के रुपये भी वे ही भरते रहे। इस घराने के पुराने कागजात और सीकर दफ्तर से यह प्रकट है कि सीकर की फौतेदारी(ओहदा) तथा लेन-देन का क्रम संवत् 1792 से प्रारम्‍भ होकर बहुत समय तक जारी रहा। इतिहास प्रसिद्ध अमीर खां पिंडारी ने जब शेखावटी पर आक्रमण करना प्रारम्‍भ किया तब पुरोहित सूरतरामजी व रामचन्‍द्र जी ने शेखावत सरदारों और उनकी प्रजा की हित कामना से प्रेरित होकर बड़ी रकम के द्वारा अमीर खां को हमला करने से रोका और वापिस लौटाया। इस सहायता के लिए तत्‍सामयिक शेखावाटी के सरदारों ने बड़ा आभार माना और उन्‍हें हाथी सिरोपाव के सिवाय कई गांव की जमीन उदक सीगे देकर अपना सम्‍मान प्रकट किया। जगात आदि की सुविधाएं दी गई।
   
 

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