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सुधन्‍वा जी
पारीक पुरोहित प्रारंभ से ही राजगुरु रहे हैं। मर्यादा पुरूषोतम राम के राजगुरु महर्षि वशिष्‍ठ थे। कालांतर में भी पारीक पुरोहित राजा महाराजाओं के राजगुरू रहे। विक्रम संवत् की नवीं शताब्दि के अंतिम चरण में पारीक कुल भूषण सुधन्‍वा जी हुए। आप महाराजा सोढ़देव के गुरू थे। महाराजा सोढदेव परम धार्मिक राजा नल के वंशजों में से थे। सुधन्‍वा जी महाराजा ने राजा सोढ़देव की प्रेरणा से एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। संभवत: सर्वप्रथम पारीकों की जनगणना जहां इस यज्ञ के आयोजन से हुई वहीं तत्-समय यह भी निश्यित हुआ कि पारीकों के 9 आस्‍पाद, 12 गोत्र और 108 शाखायें विद्यमान हैं। ''परांकुश मुनि'' व्‍यास के अनुसार- ''मध्‍यदेश में निषध नाम का देश है। जहां भूतल पर प्रसिद्ध नरवर नाम का एक नगर है। जहां पर परम धार्मिक राजा हुए थे। नल से तेईसवीं पीढ़ी में सोढ़देव नाम के राजा हुए, इनका समय विक्रम की नवमी शताब्‍दी का समाप्ति काल है। उनके पारीक जाति के ही सुधन्‍वा नामक गुरू थे, सोढ देव ने गुरू की आज्ञा से एक यज्ञ किया था-''  ''उस यज्ञ में भारत के सब देशों में निवास करने वाले ब्राह्मणों को बुलाया गया था। कुछ मनुष्‍य तो उस यज्ञ कर्म में भाग लेने के लिए आये थे और कुछ केवल दर्शन करने के लिए आये थे।'' '' सबसे प्रथम पारीकों की गणना इसी यज्ञ में हुई थी। वहां इनके नौ आस्‍पद, बारह गोत्र और 108 शाखाऐं गिनी गई।''
   
 

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