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वराह जी पुरोहित
ब्रह्मा जी की तप:स्‍थली एवं सृष्टि-रचना की आद्य यज्ञस्‍थली पुष्‍कर अनादिकाल से हिन्‍दुओं का तीर्थ रहा है। पुराण आदि में पुष्‍कर का माहात्‍म्‍य बताया गया है कि लोक जीवन में तीर्थराज पुष्‍कर की जो मान्‍यता है वैसी मान्‍यता, भारत के कम ही तीर्थस्‍थलों की है। इसलिए पुष्‍कर को तीर्थराज कहते हैं। इसी तीर्थराज पुष्‍कर में पारीक कुलभूषण वराह ज़ी ने सर्वप्रथम श्री वराह जी के मंदिर की स्‍थापना की जो वराहघाट पर अपनी भव्‍यता लिए हुए आज भी हमें इस महापुरूष की याद दिलाता है। उक्त मंदिर का निर्माण अरनो राजा (1123-50 ई.) द्वारा कराया गया। पुरोहित वराह जी का जन्‍म विक्रम की 11वीं शताब्दि के अंत में मरूस्‍थल मण्‍डलातर्गत जायल नगर में पारीक्ष जातीय कांथडया पुरोहित कुल में हुआ। वराह जी का जन्‍म स्‍थान जायल बताया जाता है। आपके पोते मोहन जी उर्फ सेढाजी हुए हैं। वराह जी ने तीर्थराज पुष्‍कर में वराह घाट पर वराह जी का मंदिर बनवाया तथा उन्‍होंन विश्रृंखलित होती षड्जाति का उद्धार किया।
वराह जी पुरोहित जहां वेद वेदांगादि सकल शास्‍त्रों के उच्‍च कोटि के विद्वान थे वहीं वे नारायण के अनन्‍य भक्त भी थे। ब्राह्मणों को संगठित करने का इन्‍होंने अद्वितीय प्रयास किया और इसी संदर्भ में उन्‍होंने छन्‍याती ब्राह्मणों का एक विशाल सम्‍मेलन आयोजित किया जिसमें भारत के सभी ब्राह्मण समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पारीक्ष संहिता के अनुसार ब्राह्मणों के उक्त महासम्‍मेलन में उपस्थिति निम्‍न प्रकार थी-
1. श्री पारीक्ष ब्राह्मण 12.गोत्रों की 108 शाखा के।
2. श्री सारस्‍वत ब्राह्मण 17 गोत्रों की 152 शाखा के।
3. श्री दाधीच ब्राह्मण 12 गोत्रों की 100 शाखा के।
4. श्री गुर्जर गौड़ ब्राह्मण 12 गोत्रों की 156 शाखा के।
5. श्री आदि गौड़ ब्राह्मण 24 गोत्रों की 444 शाखा के।
6. श्री शिखवाल ब्राह्मण 4 गोत्रों की 49 शाखा के।
वराह जी पुरोहित द्वारा आयोजित उक्त सम्‍मेलन में उपस्थित सभी महानुभावों ने यह निर्णय किया कि ''गोत्र, शाखा, प्रवर आदि की नियमित गणना रखी जावे। हमारी जाति में अन्‍य नकली ब्राह्मणों का प्रवेश न हो तथा जाति में कितनी न्‍यूनता व अधिकता हुई इसकी संख्‍या रखने के लिए अपनी अपनी जाति से एक एक व्‍‍यक्ति चुना जाये और उसके निर्वाह  के लिए जातीय उत्‍सवों (विवाहादि) में पारितोषिक दिया जाये। ऐसा व्‍यक्ति अपनी जाति के गोत्र, शाखा, प्रवर आस्‍पद तथा जाति की बढ़ोतरी घटोतरी का पूरा विवरण लिखा करे।''
उपरोक्‍त सम्‍मेलन में ही सभी ब्राह्मण समाज के लिए पृथक-पृथक रूप से कुल गुरुओं की स्‍थापना की गई। तथा पारीकों के लिए 'माधव जी ने अपना कुल गुरू वत्‍स गोत्र के लापस्‍या जोशी खाण्‍डेराव जी को बनाया। सरखत और मजहर के अनुसार ''आगे पिरोहित बराह जी पोहषर जी (पुष्‍कर) में यज्ञ कियो जदि माधो ने संकल्‍प कियो छो सो भाट थरप्‍यो अर कापड़ा कने नांवा की पोथी की सो माधो ने दिवाई अर लापस्‍या जोशी माधो का बेटा पोता की लार लगाया सो अब जोसी जोगाजी अर पिरोथ श्री धरजी  लापस्‍या की या मरजाद बांधी.......
   
 

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