Pareek Vansh Parichay
 
 

 
Home > Pareek Vansh Parichay > Utpatti > Brahman Uttpati
   
और इनके योगबल से धृतराष्‍ट्र, पांडु और विदुर का जन्‍म हुआ। ब्रह्म ऋषि व्‍यास जी परम ब्रह्म और अपर ब्रह्म के ज्ञाता कवि (त्रिकालदर्शी) सत्‍यव्रतपरायण तथा परम पवित्र हैं। इनकी बनाई हुई महाभारत संहिता सब शास्‍त्रों के अनुकूल वेदार्थों से भूषित तथा चारों वेदों के भावों से संयुक्‍त है। प्रत्‍येक मन्‍वन्‍तर और प्रत्‍येक द्वापर में भिन्‍न-भिन्‍न व्‍यास हुआ करते हैं। व्‍यास जी का नाम व्‍यास इसलिए पड़ा कि वे वेदों का विभाग करते हैं। वैवस्‍वत मनवन्‍तर के अठाईसवें द्वापर में म‍हर्षि पराशर के द्वारा सत्‍यवति के गर्भ से उत्‍पन्‍न होने वाले भगवान कृष्‍ण द्वैपायन ही व्‍यास हुए हैं।
व्‍यास जी की पत्‍नी का नाम पिंगला था। इनके गर्भ से ही महाम‍ुनि शुकदेव का जन्‍म हुआ था जिन्‍होंने माता के गर्भ में ही लौकिक बंधनों से मुक्‍त होने की कामना आरंभ कर दी थी। भगवान वेदव्‍यास ने भागवत पुराण का प्रणयन कर लिया किन्‍तु उनके सम्‍मुख अध्‍यापन की समस्‍या थी। उन्‍होंने अपने ध्‍यान बल से देखा तो उन्‍हें ज्ञात हुआ कि श्री शुकदेव के अन्‍त: स्‍थल में पहिले से ही श्रीमद्भागवत के संस्‍कार विद्यमान हैं। क्‍योंकि पूर्व जन्‍म में जब वो तेते केगले हुए अंडे के रूप में कैलाश पर्वत पर पड़े हुए थे तब भगवान शंकर के मुख से श्रीमद्भागवत की कथा सुनकर ये जीवित हो गए थे और पार्वती के सो जाने पर भी ऊं ऊं का उच्‍चारण करते हुए स्‍वीकृति वचन देते रहे थे।
श्री शुकदेव जी गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश लेना नहीं चाहते थे। व्‍यास जी ने उन्‍हें बहुत समझाया अंत में विदेहराज जनक जी के यहां धर्म की निष्‍ठा एवं मोक्ष का परम आशय पूछने के लिए मिथिला भेजा। राजा जनक ने अनेक प्रकार से परीक्षा लेकर उनमें पात्रता देखकर उन्‍हें गृहस्‍थाश्रम का महत्‍व बतलाते हुए विवाह करने का उपदेश दिया था। मिथिला से लौटकर उन्‍होंने पिता की आज्ञा से 'पीवरी' नामक पितरों की कन्‍या से विवाह किया. उसमें उन्‍होंने पांच पुत्र कृष्‍ण, गौर, प्रभु, भूरी, देवश्रुत तथा किर्ती नाम (कृत्‍वी) कन्‍या उत्‍पन्‍न की। शुकदेव जी की पुत्री कृत्‍वी से ब्रह्मदत्त उत्‍पन्‍न हुए। इनका दूसरा नाम पितृवर्ती था। श्राद्धकल्‍प में किए जाने वाले श्‍लोकों के पाठ से ब्रह्मदत्त जी का घनिष्‍ठ संबंध है। इन श्‍लोकों के पाठ से पितरों की तृप्‍ती मानी जाती है। ब्रह्मदत्त जी का विवाह देवल ऋषि की कन्‍या सन्‍नति से हुआ था। इनकी दूसरी पत्‍नी का नाम गौ था। ब्रह्मदत्त जी ने काशीराज की नौ कन्‍याओं से विवाह किये थे, जिससे 103 खांप पारीकों की उत्‍पति हुई।
कतिपय विद्वानों के अनुसार पराशर जी की पत्‍नी का नाम मत्‍स्‍यगंधा, व्‍यासजी की पत्‍नी का नाम अरणि तथा शुकदेव जी की पत्‍नी का नाम पीवरी था उनके पुत्र और एक कन्‍या का होना बताया है। शुक‍देव जी की कन्‍या कीर्तिमति का विवाह विभ्राज के पुत्र अणुह के साथ हुआ था।
शुकदेवजी ने अपने 12 पुत्रों को विद्या पढ़ने के लिए भेज दिया था। उन 12 पुत्रों के नाम भूरश्रवा(भारद्वाज), प्रभु (पराशर), शंभु (कश्‍यप), कृष्‍ण (कौशिक), गौर (गर्ग), श्‍वेतकृष्‍ण(गौतम), अरुण(मुद्गल), गौरश्‍याम(शान्डिल्‍य), नील (कोत्‍स), धुम्र(भार्गव), बादरि(वत्‍स), उपमन्‍यु(धोम्‍य) इनमें से 12 नाम गुरुजी द्वारा दिए गए हैं। एक अन्‍य पुस्‍तक में लिखा है कि शुकदेव जी के कीर्तिमति नाम कन्‍या तथा पांच पुत्र हुए जिनके नाम भूरिश्रवा:, प्रभु:, शम्‍भु:, कृष्‍ण: तथा गौर: हैं। कीर्तिमति को शुक वंश में प्रसिद्ध होने के कारण ब्रह्मदत्त जी भी पराशर के पक्ष में गये।
   
 

Designed By: Manoj Pareek & Vikash Pareek (ARK Web Solution) Copyright ® 2010. PareekPariwar.org  
Home | Pareek Vansh Parichay | Vyaktigat Parichay | Events | Feedback | Contact Us | Privacy Policy | Sitemap