इस आश्रम में पति और पत्नी एक दूसरे के प्रति सहयुक्त होकर धर्मानुसार व्यवहार करते हैं। गृहस्थाश्रम से ही अन्य आश्रमों का विस्तार और विकास होता है तथा उसी के अनुग्रह और आदर पर अन्य आश्रम पूर्णत: निर्भर करते हैं। इसलिए इस आश्रम का ज्येष्ठ और श्रेष्ठ दोनों कहा है। इस आश्रम रूपी गाड़ी के दो पहिए- पति और पत्नी हैं दोनों को चाहिए कि अत्यन्त संयमपूर्वक, धैर्यपूर्वक इस गाड़ीरूपी गृहस्थ धर्म का संचालन कर सफल जीवन जिएं।