Pareek Vansh Parichay
 
 

 
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वर्णधर्म का पूर्णत: सश्रम पालन करने का निर्देश भगवान पराशर द्वारा दिया गया है। सभी वर्णों के कर्म पूर्व निर्धारित है तथा वर्णधर्म से कर्मच्‍यूत व्‍यक्ति को निन्‍दनीय कहा है- "भीरूराजन्‍यो ब्राह्मण:........वैश्‍यो.....हीनवर्णो...... एते सर्वे शोच्‍यतां......(पा. गीता 1/25-26) अत: जो मनुष्‍य दुस्‍कर्म करके वर्णधर्म से भ्रष्‍ट हो जाता है वह कदापि सम्‍मान पाने योग्‍य नहीं है- वर्णेभ्‍योहि परिभ्रष्‍टों न वै सम्‍मानमर्हति"(पा. गीता 2/4)। इस प्रकार वर्णधर्मानुसार स्‍वधर्म का पालन मनुष्‍य मात्र को करना चाहिए। भगवद्गीता भी इसी का समर्थन करते हुए कहती है- स्‍वधर्मे निधंन श्रेयं परधर्मो भयावहृ:"।
चतष्‍आश्रमों में से गृहस्‍थाश्रम की सभी धर्मग्रंथों ने मुक्‍त कंठ से प्रशंसा की है। महर्षि पराशर ने भी गृहस्‍थाश्रम की अधिकाधिक प्रशंसा की है। उनके अनुसार जिस प्रकार सभी नदी-नद सागर में जाकर मिलते हैं, उसी प्रकार समस्‍त आश्रम गृहस्‍थ का ही सहारा लेते हैं-
यथा नदीनदा: सर्वेसागरे यान्ति संस्यितिम्।
एवमाश्रमिण: सर्वे गृहस्‍थे यान्ति संस्थितिम्।। (पा. गीता 6/39)
इस आश्रम में पति और प‍त्‍नी एक दूसरे के प्रति सहयुक्‍त होकर धर्मानुसार व्‍यवहार करते हैं। गृहस्‍थाश्रम से ही अन्‍य आश्रमों का विस्‍तार और विकास होता है तथा उसी के अनुग्रह और आदर पर अन्‍य आश्रम पूर्णत: निर्भर करते हैं। इसलिए इस आश्रम का ज्‍येष्‍ठ और श्रेष्‍ठ दोनों कहा है। इस आश्रम रूपी गाड़ी के दो पहिए- पति और पत्‍नी हैं दोनों को चाहिए कि अत्‍यन्‍त संयमपूर्वक, धैर्यपूर्वक इस गाड़ीरूपी गृहस्‍थ धर्म का संचालन कर सफल जीवन जिएं।
गृहस्‍थाश्रम के अंतर्गत व्‍यक्ति कई ऋणों से मुक्ति प्राप्‍त करता है। भगवान पराशर के अनुसार प्रत्‍येक मनुष्‍य देवता, अतिथी, भरण-पोषण योग्‍य कुटुम्‍बीजन, पितर तथा अपने-आप का ऋणी होकर जन्‍म लेता है-
देवतातिथिभृत्‍येभ्‍य: पितृभ्‍यश्‍चात्‍मनस्‍तथा।
ऋणवान् जायते मर्त्‍यस्‍तस्‍मादनृणतां व्रजेत।।(पा. गीता 3/9)
अत: वेद-शास्‍त्रों का स्‍वाध्‍याय करके ऋषियों के यज्ञ कर्म द्वारा देवताओं के श्राद्ध और दान से पितरों तथा स्‍वागत-सत्‍कार, सेवा आदि से अतिथियों के ऋण से छुटकारा होता है। इसी प्रकार वेद-वाणी के पढन-श्रवण एवं मनन से यज्ञ शेष अन्‍न के भोजन से तथा जीवों की रक्षा करके मनुष्‍य अपने ऋण से मुक्त होता है। भरणीय कुटुम्‍बीजन के पालन-पोषण आरंभ से ही प्रबंध करना चाहिए, इससे उनके ऋण से मुक्ति होती हो जाती है (पा. गीता 3/10-11)
ऋण मुक्ति का तात्‍पर्य कर्त्तव्‍यों का निस्‍काम भाव से निर्वहन करने से है। ऐसा करने पर जीव अपने प्रकाश को, मूल स्‍वरूप को उदीप्‍त कर मुक्‍त होने का प्रयास करता है।
   
 

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