Pareek Vansh Parichay
 
 

 
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6. प्रवर - "वैदिक कर्म-यज्ञ-विवाहादिक में पिता, पितामह, प्रपितामहादि का नाम लेकर संकल्‍प पढ़ा जाता है (यह रीति कर्म-काण्डियों में अब भी विद्यमान है) इन्‍हें ही प्रवर कहते हैं। इनकी जानकारी के बिना कोई भी ब्राह्मण धर्म-कार्य का अधिकारी नहीं हो सकता, अत: इनका जानना भी अति आवश्‍यक है।
7. पाद - "वेद-स्‍मृतियों में कहे हुए धर्म-कर्म में पाद नवा कर बैठने की आज्ञा है। जिस गौत्र का जो पाद है, उसको उसी पाद को नवाकर बैठ कर वह कर्म करना चाहिये।
8. शिखा -  "जिस समय बालक का मुण्‍डन संस्‍कार होता है, उस समय बालक के‍ शिखा रखने का नियम है। जिनकी दक्षिण शिखा है, उनको दक्षिण तरफ और जिनकी वाम शिखा है, उनको वाम की तरफ शिखा रखवानी चाहिये।
9. देवता - "सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने जिस देवता द्वारा ऋषियों को जिस वेद का उपदेश दिलवाया, उस वेद का वही देवता माना गया।

जैसे –

अग्निवायुरविभयस्‍तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञसिद्धयर्थमृम्‍यजु: सामलक्षणम्।। (मनु: 1/23)

अर्थ- अग्नि, वायु, सूर्य इन देवताओं से यज्ञ का प्रचार करने के लिए ऋक्, यजु:, साम इन तीन वेदों का प्रचार प्रजापति ने करवाया, इसिलये जिस वेद का जिस देवता ने प्रथम उपदेश दिया, उस वेद का वही देवता माना गया। इस प्रकार गौत्र, वेद, उपवेद, शाखा, सूत्र, प्रवर, शिखा, पाद और देवता इन 9 बातों को जानना प्रत्‍येक ब्राह्मण का धर्म है। इन्‍हीं 9 बातों के आधार पर महर्षियों ने नवगुणित यज्ञोपवीत का निर्माण किया गया था। यज्ञोपवीत (जनेऊ) 9 सूत्रों का होता है, जिसमें प्रत्‍येक सूत्र में इन्‍हीं देवताओं का आह्वान करके उसमें इनकी प्रतिष्‍ठा की जाती है।"

 

   
 

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