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जाति की शाखाओं का अर्थ भेद क्या है, यह विषय शोध के दृष्टिकोण से अभी तक अनुत्तरित ही रहा है। मेरी सम्मति में जातियां दो प्रकार से बनी- व्यक्ति की विद्यापीठ से, जिसके अनुसार जिस मूल गुरू के यहां व्यक्ति विशेष ने शिक्षा ग्रहण की वही उसका गौत्र बन गया एवं द्वितीय रक्षापीठ से, जो व्यक्ति रक्षा करते थे, उसके अनुरूप गौत्र बन गए।
इसी प्रकार गौत्रों का प्रचलन भी मेरी सम्मति में व्यवसाय से, सम्मान से एवं स्थान विशेष से हुआ है। इस सम्बन्ध में पारीक संहिता एवं पारीक प्राबोध में हमारी जाति की 103 शाखाओं का जो अर्थ भेद या इन शाखाओं का प्रादुर्भाव दिया गया है वह दृष्टव्य है-
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