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महाभारत शान्तिपर्व 327/ 46/ 47
अर्थात् शिष्‍य के चरित्र की बिना परीक्षा लिये कभी भी शिक्षा नहीं देनी चाहिये। जैसे स्‍वर्ण की परीक्षा तपाने, काटने और कसौटी पर घिसने से होती है, उसी प्रकार शिष्‍यों की परीक्षा भी सदाचरण, उत्तम गुणों और उत्तम वंश से करनी चाहिये। आप लोगों को अपने शिष्‍यों को किसी अनुचित या महा भयानक कार्य में कभी न लगाना चाहिये।
म‍हर्षि पराशर के वंशज न केवल अपने शिष्‍यों के वेद-वेदांग के पठन और सदाचरण आदि की परीक्षा करते थे, अपितु स्‍वयं का भी सदैव उक्‍त कसौटियों पर परखते रहते थे। इस कारण वे पारीक्ष नाम से सर्वत्र लोकप्रिय हुए, जो कालान्‍तर में अपभ्रंश होकर 'पारीख' एवं 'पारीक' हो गया। अतएव वेदोक्‍त धर्म और कर्म की परीक्षा न्‍यायसंगत युक्तियों से विचार करते हुए स्‍वात्‍मा के कल्‍याण के प्रयोजन को पूर्ण करने में जो सदा तत्‍पर रहता हो, विद्वान उसको 'पारीक्ष' अथवा 'पारीक' कहते हैं।
व्‍यास पुरूषोत्तम जी शास्‍त्री (मथुरा) द्वारा 'पारीक' शब्‍द को निम्‍नानुसार परिभाषित किया गया है-

वैदस्‍यसरहस्‍थस्‍यविचारों मुनिर्भिस्‍मृत:।

परीक्षातेन युक्‍तास्‍ते 'पारीक्षा:' ब्राह्मणा: स्‍मृता:।।

अर्थात कर्म, ज्ञान और उपासना काण्‍ड युक्‍त वेद तथा व्‍याकरण, निरूक्‍त, छन्‍द, कल्‍प, शिक्षा और ज्‍योतिष- इन वेदांगों को जो ब्राह्मण भली-भांति पढ़-लिखकर उनके सिद्धांतों को अपने विचार द्वारा निर्णय करके जनता को समझा सके, उसे पारीक्ष ब्राह्मण कहते हैं।
इस प्रकार "पारीक्ष" शब्‍द से पारीक शब्‍द की व्‍यूत्‍पत्ति अधिक व्‍यावहारिक, विश्‍वसनीय एवं समीचीन ज्ञात होती है।
'पारा‍शरिक' शब्‍द से 'पारीक' शब्‍द का उद्भव
महर्षि पराशर के वंशज 'पारीक' जाति के रूप में प्रसिद्ध हुए, जैसा कि उल्‍लेख किया गया है। इसी कारण 'पारीक' शब्‍द की व्‍युत्‍पत्ति 'पराशर' शब्‍द से ही मानने का विभिन्‍न विद्वानों का मत स्‍वाभाविक एवं उचित प्रतीत होता है। इन विद्वानों की मान्‍यता है कि 'पाराशरिक' शब्‍द का तद्भव रूप 'पाराहरिक' हुआ, क्‍योंकि कई स्‍थानों पर 'श' व 'स' को 'ह' के रूप में उच्‍चारण करने की प्रवृत्ति है, जैसे सड़क को हड़क आदि। 'पाराहरिक' में से कालान्‍तर में प्रयत्‍न लाघव भाषागत प्रक्रिया के अधीन 'राह' का लोप होकर उसके स्‍थान पर 'पारीक' शब्‍द रह गया, जिसमें 'रि' की छोटी मात्रा 'री' में परिवर्तित हो गई।
ब्रह्मज्ञान एवं आध्‍यात्‍म मार्ग के साधकों तथा अन्‍वेषकों को लोक में प्राचीन काल से ही 'पारीक' नाम से जाना जाता था। सन्‍द दादू दयाल जी की निम्‍न वाणी से इस तथ्‍य की पुष्टि होती है-
केते पारीक पचि मुए, कीमत कही न जाय।
दादू सब हैरान हैं, गूंगे का गुड़ खाय।।
ब्रह्मदत्त से पारीकों की वंश परम्‍परा की मान्‍यता
कृष्‍ण द्वैपायन- पुत्र शुकदेव-महाभारत, श्रीमद्भागवत एवं अनेकानेक पुराणें में शुकदेव को कृष्‍ण द्वैपायन का पुत्र बताया गया है। श्रीमद्भागवत के प्रवचन - कर्ता शुकदेव ने जन्‍म लेते ही वैराग्‍य धारण कर लिया था- अत: इन शुकदेवजी के आगे वंश वृद्धि नहीं हुई। श्रीमद्भागवत में (छाया) शुक के 4 पुत्र एवं एक पुत्री कीर्तिगत (कहीं-कहीं पुत्रों की संख्‍या 5, 12 तक भी बताई गई है) होने का उल्‍लेख है। कृष्‍ण द्वैपायन एवं उनके पुत्र शुकदेव महाभारत काल में हुए हैं, अत: इस काल-गणना के आधार पर कृष्‍ण द्वैपायन मैत्रावरूणि वसिष्‍ठ-पौत्र पराशर के पुत्र एवं पौत्र स्‍थापित नहीं होते हैं, जैसा कि पूर्व में विवेचन किया गया है।
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