जाति भास्कर एवं ब्राह्मणोंत्पतिमार्तन्ड ग्रंथ में 12 और 84 तथा ब्राह्मण निर्णय में 18 और जाति अन्वेषण में 37 भेद लिखे है।। जनमेजय राजा के समय गौड़ जाति के 1444 भेद हुए। वे समस्त भेद कोई वंश विशेष के नाम से, कोई देश भेद से और कोई कुल प्रवर्तक ऋषी के नाम से हुए। जैसे मालवी गौड़, श्री गौड़, गंगा पुत्र गौड़, वशिष्ट गौंड़, सौरभ गोड़, दालिभ्य गौड़, भटनागर गौड़, सुर्यद्वज गौड़, मथुर गौड़, बाल्मिकी गौंड़, पारीक गौड़, सारस्वत गौड़, गुर्जर गौड़, शिखवाल गौड़, दाधीच गौड़, आदि । समय समय पर भगवान शंकराचार्य, रामनुज, वल्लभाचार्य आदि महात्माओं ने प्रकट होकर हिन्दू जाति के उद्धारार्थ बहुत कुछ प्रयत्न किया तथा सफल भी हुए, पर हिन्दू विशेषकर ब्राह्मण जाति नहीं संभली, परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणगण आपस में ही एक दूसरे की निन्दा और अपनी मिथ्या स्तुति करते हुए परस्पर ब्राह्मद्रोह का लाभ करने लगे। ब्राह्मणों की ऐसी अधोगति और कर्तव्यहीनता देखकर राजपूताना प्रदेश के अधिपति ब्राह्मणवत्सल महाराज सवाई जयसिंह को बड़ी चिन्ता हुई और उन्होंने अपने कुलगुरू पुरोहित (जो कि एक पारीक थे) की सम्मति से ब्राह्मणों में एकता और संगठन के लिये प्रशंसनीय उद्योग किया। |