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उनकी मिश्रित (मिलीहुई) वृति होने से वे मिश्र अर्थात (बोहरा) कहलाने लगे। जो ब्राह्मण कर्मकाण्‍ड से प्रकाण्‍ड पंडित होकर देवता और ब्राह्मणों से यज्ञादि से भरण पोषण करते थे वे भट्ट कहलाये। वे ही किसी कारण वश कौशिकी नदी के तट पर निवास करने के कारण कौशिक भट्ट कहलाये। पारीकों में गौत्रों का प्रचलन भी व्‍यावसाय, सम्‍मान एंव स्‍थान विशेष से हुआ है। जैसे बई ग्राम में रहने से बैया हो गये। ओडींट ग्राम में रहने से ओडींट हो गये। जो अग्निहोत्र करते थे, उनका नाम अग्‍नोत्‍या हो गया। जो धर्म प्रचार के लिए संसार में भ्रमण करते थे वे भ्रमाणा हो गये। भार्गव मुनि के शिष्‍य भारगों कहलाये। रतनपुरा गावं में रहने से रतनपुरा हो गये। जो कठोती गांव में रहते थें वे कठोतिया हो गयें।
जवाली ग्राम में रहने वाले जावला हो गयें। रोजड़ा ग्राम में रहने से रोजड़ा कहलाये। गोगड़ा ग्राम में बसने से गोगड़ा हो गये। गोलवा गांव के निवासी गोलवाल हो गये। जो ब्राह्मण ब्राह्मणों की सेवा करते थे वे बामणिया हो गये। जो ब्राह्मण ओजस्‍वी थे वे ओझाया हो गये। जो भोजन में मिष्‍ठान अधिक खाते थे वे लापस्‍या हो गये। धार्मिक कार्यो में जिनका वरण किया जाता था, वे वरणा हो गये। जो अपनी पण्डिताई को संसार में प्रकट करते थे वे पिंडताणिया हो गये। सुरेड़ी गांव में रहने वाले सुरेड़ीया हो गये।  छ: न्‍याति संघ की स्‍थापना: - ब्राह्मणों के प्रथम उत्‍पति स्‍थान को मनु ने ब्राह्मवर्त नाम के देश से वर्णन किया है और उसे देवनिर्मित देश लिखा है। उन्‍होंने उस देश की सीमाएं भी निर्दिष्‍ट की है और लिखा है कि वह देश सरस्‍वती और गन्‍डकी नदियों के बीच स्थित हैं। ब्राह्मणों की उत्‍पति बार-बार जीस देश मे होती हैं उस देश को ब्राह्मवर्त कहते हैं। कुरूक्षेत्र-मत्‍स्‍य (मारवाड़-ढुंढाड़, मेवाड़-शेखावाटी) पंचाल (पंजाब) शूरसेन (मथुरा) ये पूर्वोक्‍त ब्राह्मवर्त से मिले हुए हैं। सब साधक, बाधक प्रमाणों का समन्‍वय करने से सिद्धान्‍त यह निकलता हैं कि पूर्व में गन्‍डकी गंगा का संगम पश्चिम तथा दक्षिण सरयू, उत्तर में हिमालय इन चारों के मध्‍य में गौड़ देश सिद्ध हैं। गौड़ जाति में सैकड़ों बल्कि हजारों भेद हैं।
जाति भास्‍कर एवं ब्राह्मणोंत्‍पतिमार्तन्‍ड ग्रंथ में 12 और 84 तथा ब्राह्मण निर्णय में  18 और जाति अन्‍वेषण में 37 भेद लिखे है।। जनमेजय राजा के समय गौड़ जाति के 1444 भेद हुए। वे समस्‍त भेद कोई वंश विशेष के नाम से, कोई देश भेद से और कोई कुल प्रवर्तक ऋषी के  नाम से हुए। जैसे मालवी गौड़, श्री गौड़, गंगा पुत्र गौड़, वशिष्‍ट गौंड़, सौरभ गोड़, दालिभ्‍य गौड़, भटनागर गौड़, सुर्यद्वज गौड़,  मथुर गौड़, बाल्मिकी गौंड़, पारीक गौड़, सारस्‍वत गौड़, गुर्जर गौड़, शिखवाल गौड़, दाधीच गौड़, आदि । समय समय पर भगवान शंकराचार्य, रामनुज, वल्‍लभाचार्य आदि महात्‍माओं ने प्रकट होकर हिन्‍दू जाति के उद्धारार्थ बहुत कुछ प्रयत्‍न किया तथा सफल भी हुए, पर हिन्‍दू विशेषकर ब्राह्मण जाति नहीं संभली, परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणगण आपस में ही एक दूसरे की निन्‍दा और अपनी मिथ्‍या स्‍तुति करते हुए परस्‍पर ब्राह्मद्रोह का लाभ करने लगे। ब्राह्मणों की ऐसी अधोगति और कर्तव्‍यहीनता देखकर राजपूताना प्रदेश के अधिपति ब्राह्मणवत्‍सल महाराज सवाई जयसिंह को बड़ी चिन्‍ता हुई और उन्‍होंने अपने कुलगुरू पुरोहित (जो कि एक पारीक थे) की सम्‍मति से ब्राह्मणों में एकता और संगठन के लिये प्रशंसनीय उद्योग किया।
अश्‍वमेघयज्ञ के उपलक्ष्‍य में सम्‍वत 1645 चैत्रमास के शुक्‍ल पक्ष में समस्‍त देश के ब्राह्मणों का सम्‍मेलन कराके '' छ: न्‍याति संघ '' की स्‍थापना कि गई। जिसमें पारीक ब्राह्मणों को प्रथम स्‍थान पर रखा गया। सम्‍मेलन में निर्णय हुवा कि छ: न्‍याति संघ में भोजन व्‍यवहार एक और कन्‍या सम्‍बन्‍ध निज,निज वर्ग में निश्चित हुवा।
उस सभा में  ब्राह्मणों ने विद्वानों का इस प्रकार निर्णय सुना तो पारीक ब्राह्मण ही छन्‍याति वाले  ब्राह्मणों में सबसे प्रथम सहभोज में मिलकर छ: न्‍याति के भोजन में शामिल हुए। इसके अनन्‍तर छ: न्‍यति समुदाय के सारस्‍वत, दाहिमा, गौड़, गुर्जर गौड़, और शिखवाल भोजन में सम्मिलित हो गये। इसी कारण उसी दिन से छ: न्‍याति ब्राह्मणों में सह भोज होने लगा और विवाह, अपने अपने समुदाय में होने लगा। इस के बाद में खन्‍डेलवाल ब्राह्मण भी जब छ: न्‍यति से मिलने को तैयार हुए तो उनकी कहीं तो स्‍वीकार किया तथा कहीं तो नहीं किया।
 
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