यज्ञोपवीत के तीन प्रधान तार होते हैं जो सृष्टि के समस्त पहलुओं में व्याप्त त्रिविध धर्मों की ओर हमारा ध्यान दिलाते हैं। तीन सूत्रों से तीन ऋणों का भी बोध होता है जैसे ब्रह्मचारी से ऋषि ऋण, यज्ञ से देव ऋण और प्रजापालन से पितृऋण चुकाया जाता है। पूर्व जन्मों में संचित हुए पाप यज्ञोपवीत सूत्र धारण करने मात्र से ही नष्ट हो जाते हैं, लेकिन आज के युग में ब्राह्मण भी इस पवित्र सूत्र को धारण नहीं कर रहे हैं। फलस्वरूप पथ-भ्रष्ट होकर नाना प्रकार के दुख उठाने पड़ते हैं। यज्ञोपवीत को ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय एवं वैश्य को भी धारण करने का अधिकार शास्त्रों में है। इसे धारण करने का विधान तीनों (ब्राह्मणों, क्षत्रिय, वैश्य) के लिए अलग-अलग आयु के अनुसार भी है, लेकिन विवाह के समय अवश्य ही धारण करने का निर्देश है। इस पवित्र सूत्र में क्या रहस्य है इसको जानना द्विजमात्र का धर्म है, अत: सर्वप्रथम इसके निर्माण का रहस्य ज्ञात करना चाहिए। शुद्ध पवित्र सूती धागा जो खंडित नहीं तथा एक धागा हो, जिसकी लंबाई 96 अंगुल अपने हाथ की अंगुलियों से होनी चाहिए। क्योंकि स्मृतिकारों का मत है कि मनुष्य की ऊंचाई अधिक से अधिक 108 अंगुल होती है और मध्य ऊंचाई 96 अंगुल होती है। यह 96 अंगुल ही क्यों लिया जाता है इसका भी कारण है। वर्ष में 12 मास, 15 तिथि, 7 वार, 27 नक्षत्र, 25 तत्व, 4 वेद, 3 गुण, 3 काल इन सबका योग 96 होता है। आचार्यों के मत से 4 वेदों का सार ब्रह्म गायत्री 24 अक्षर हैं अत: 4x24=96 अंगुल ही श्रेष्ठ है। |