Pareek Vansh Parichay
 
 

 
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ब्राह्मणों को तीनों वेदों का अधिकारी माना गया है। अत: इस 96 अंगुल तंतु को 3 लड़ा करके हाथ से कातते हैं तो धागा स्‍वयं त्रिगुणी हो जाता है और इसी धागे से यज्ञोपवीत बनाया जाता है फिर इसके ऊपर प्रथम ग्रंथी ब्रह्मा की, द्वितीय ग्रंथी विष्‍णु की, तृतीय ग्रंथी महेश की और उसके ऊपर जो गांठ लगाई जाती है वह ऊं स्‍वरूप है। इन तीनों ग्रंथियों को श्री ब्रह्मा ने तीनों वेदों से अभिमंत्रित कर तीन धागों का यह सूत्र बनाया, श्री विष्‍णु ने उपासना ज्ञान द्वार इसे अभिम‍ंतित्रत कर त्रिगुणित किया तथा रूद्र ने इसे गायत्री मंत्र द्वारा अभिमंत्रित कर ग्रंथी दी, अस्‍तु तीन गुणा तीन बराबर भी उत्‍पन्‍न हुए। इस प्रकार यज्ञोपवीत में मंत्रों एवं भावना से बनने वाला सूत्र चमत्‍कृत होता है। यह नौ गुणा हैं प्रथम तंतु ओमकार, द्तिीय में अग्नि, तृतीय में नागदेव, चतुर्थ में सामदेव, पंचम में पितृदेव, षष्‍टम में प्रजापति, सप्‍तम में मारूत, अष्‍टम में सूर्य एवं नवम में सम्‍पूर्ण देवताओं का वास है।
आज स्‍वयं द्वारा यज्ञोपवीत निर्माण करने का अभाव है इस कारण यज्ञोपवीत धारकों के लिए उचित है कि बाजार से खरीदे गये सूत्र को किसी पात्र में रखकर गंगाजल से प्रक्ष‍ालित करें, फिर निम्‍नलिखित एक-एक मंत्र पढ़कर चंदन, चावल, फूल को यज्ञोपवीत पर छोड़ता जाये- प्रथम तन्‍तौ ऊं ओंकारमावाह्यामि। द्वितीय तन्‍तौ ऊं अग्निमावाह्यामि। तृतीय तन्‍तौ ऊं सर्पानावाह्यामि। चतुर्थ तन्‍तौ ऊं सोममावाह्यामि। पंचम तन्‍तौ ऊं पितृनावाह्यामि। षष्‍ठं तन्‍तौ ऊं प्रजापतिमावाह्यामि। सप्‍तम तन्‍तौ ऊं अनिलमावाह्यामि। अष्‍टं तन्‍तौ ऊं सूर्यमावाह्यामि। नवम तन्‍तौ ऊं विश्‍वानदेवानावाह्यामि। प्रथम ग्रंथौ ऊं ब्रह्मणे नम:। द्वितीय ग्रंथौ ऊं विष्‍णवे नम:। तृतीय ग्रंथौ ऊं रुद्राय नम:।
ऊं यज्ञोपवीतमिति मन्‍त्रस्‍य परमेष्ठि ऋषि: लिंगोक्‍ता।
देवता: त्रिष्‍टुप छन्‍द: यज्ञोपवीत धारणे विनियोग:।।
उपरोक्‍त विनियोग के बाद निम्‍न मंत्र द्वारा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए।
ऊं यज्ञोपवीतम्‍परम पवित्रं प्रजापतेर्यत सहजं पुरस्‍तात।
आयुष्‍यमग्रयं प्रति मुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं  बलमस्‍तु तेज:।।
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्‍त्‍वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि।।
यज्ञोपवीत बदलने की आवश्‍यकता पड़ने पर निम्‍न मंत्र द्वारा पुराना यज्ञोपवीत उतार दें।
एतावत दिनर्यन्‍तं ब्रह्मत्‍वं धारितं मया।
जीर्णत्‍वातत्‍वत परित्‍यागो गच्‍छसूत्र यथा सुखम।।
इसके बाद यथाशक्ति गायत्री जाप करें।
नित्‍य कर्म के समय यज्ञोपवीत के स्‍थान हेतु पराशर स्‍मृति में निम्‍न वर्णन है-
मूत्रे तु दक्षिणे कर्णे, पुरीषे वाम कर्ण के । उपवीतं सदाघार्य, मैथूने तूपवीतकम।।
नया यज्ञोपवीत धारण करते समय दक्षिण भुजा के अंदर रखते हुए वाम कंधे पर धारन करने का विधान है। स्‍त्री संग के समय कंठ में, मूत्र त्‍यागते समय बांये कान पर व मल त्‍याग करते समय दक्षिण और वाम दोनों कर्णों पर धारण करें अर्थात लपेट लें।
यज्ञोपवीत देव, पितृ एवं ऋषि कार्यों के समय रखने के तीन प्रकार के विधान हैं-
  1. सव्‍य: सव्‍य हमेशा रखते हैं। वाम कंधे पर देव कार्य करते समय सव्‍य ही रखना चाहिए।
  2. अपसव्‍य: पितृ कार्य में दक्षिण कंधे पर करने को अपसव्‍य कहते हैं।
  3. निविजी: ऋषि कार्य करते समय कंठ में धारण करने को निविजी कहते हैं
अत: उक्‍त तथ्‍यों से स्‍पष्‍ट हो जाता है कि यह सूत्र विधिविधान से तैयार कर धारण करने से चमत्‍कृत होता है और इसके धारण के बिना प्रत्‍येक धार्मिक कृत्‍य नहीं किया जा सकता अत: इसे धारण करना प्रत्‍येक ब्राह्मण का कर्त्तव्‍य एवं धर्म है।
 
 

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